
दरअसल, No-Cost EMI में ग्राहक किसी प्रोडक्ट की कीमत को कई महीनों की किस्तों में चुका सकता है और नॉर्मल EMI की तरह अलग से ब्याज नहीं दिखाया जाता है. जैसे अगर किसी फोन की कीमत 60,000 रुपये है और उसे 6 महीने की No-Cost EMI पर खरीदा जाता है तो मोटे तौर पर हर महीने 10,000 रुपये की किस्त बन सकती है. हालांकि, ऑफर की शर्तों के अनुसार असली भुगतान इससे अलग होता है. यही वजह है कि सिर्फ EMI की रकम देखकर फैसला करना सही नहीं है.

No-Cost EMI में अक्सर बैंक या फाइनेंस कंपनी ब्याज चार्ज करती है लेकिन उस ब्याज के बराबर राशि को merchant discount या upfront discount के रूप में एडजस्ट किया जाता है.

यानी ग्राहक को EMI स्टेटमेंट में अलग से ब्याज नजर नहीं आता है लेकिन प्रोडक्ट की कीमत और डिस्काउंट का स्ट्रक्चर अलग होती है. इसी वजह से किसी ऑफर में कैश पेमेंट और EMI पेमेंट की फाइनल कीमत को देखना जरूरी है.

No-Cost EMI लेते समय कई मामलों में processing fee लग सकती है. यह शुल्क बैंक या फाइनेंस कंपनी की शर्तों पर निर्भर करता है. इसके अलावा कुछ मामलों में टैक्स भी लागू हो सकता है. मान लीजिए 60,000 रुपये के सामान पर EMI के लिए 999 रुपये की प्रोसेसिंग फीस है. ऐसे में भले ही ब्याज शून्य बताया जा रहा हो, ग्राहक का कुल खर्च 60,999 रुपये तक पहुंच सकता है अगर कोई दूसरा शुल्क या छूट लागू न हो.

कई बार No-Cost EMI के साथ मिलने वाला डिस्काउंट, नॉर्मल पेमेंट पर उपलब्ध डिस्काउंट से अलग हो सकता है. इसलिए खरीदारी से पहले यह देखना जरूरी है कि कैश/कार्ड से पेमेंट करने पर अंतिम कीमत कितनी है और EMI लेने पर टोटल पेमेंट कितना होगा. कुछ ऑफर्स में बैंक कैशबैक या इंस्टेंट डिस्काउंट भी दिया जाता है जिससे EMI की असली लागत कम हो जाती है. लेकिन हर ऑफर की शर्त अलग होती है.

अगर आप EMI को तय अवधि से पहले बंद करना चाहते हैं तो बैंक की शर्तों के अनुसार foreclosure या pre-closure charges लग सकते हैं. इसलिए सिर्फ मासिक किस्त ही नहीं बल्कि EMI के पूरे नियम और शुल्कों को पढ़ना जरूरी है.
Published at : 25 Sep 2026 05:29 PM (IST)
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