16 अप्रैल 2026 को सरकार ने तीन संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किए हैं. इनके जरिए लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़ाकर 850 (राज्यों के लिए 815 + केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35) करने का प्रस्ताव है. यह 2011 जनगणना के आधार पर होगा. इसका मकसद है कि बिना किसी मौजूदा सांसद की सीट घटाए 33% महिला आरक्षण 2029 के चुनाव से लागू हो सके. सरकार का कहना है कि हर राज्य को मौजूदा सीटों पर करीब 50% बढ़ोतरी मिलेगी, ताकि कोई राज्य नुकसान में न आए. अब सवाल उठता है कि लोकसभा को बढ़ाने के फायदे होंगे या नुकसान? जानते हैं एक्सप्लेनर में…
सवाल 1: बड़ी लोकसभा के क्या-क्या फायदे हैं?
जवाब: बड़ी लोकसभा के 5 फायदे हैं…
- एक व्यक्ति, एक वोट का सिद्धांत मजबूत होगा: अभी एक लोकसभा सीट पर औसतन 22.93 लाख लोग हैं. 850 सीटों के बाद यह औसत घटकर करीब 14.5 लाख रह जाएगा. हर सांसद अपने क्षेत्र की कम जनसंख्या को बेहतर तरीके से सेवा दे सकेगा.
- महिला आरक्षण बिना किसी की सीट घटाए लागू: 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, लेकिन पुरुष सांसदों की मौजूदा सीटें बरकरार रहेंगी. इससे राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी बिना पुरुषों के विरोध के.
- उत्तर भारत और जनसंख्या वाले राज्यों को न्याय: उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों की बढ़ती जनसंख्या को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलेगा. UP का शेयर 14.73% से बढ़कर 16.24% हो सकता है. इससे लोकतंत्र ज्यादा समावेशी बनेगा.
- राज्यों का अनुपात बरकरार: सरकार का प्लान 50% बढ़ोतरी का है, इसलिए दक्षिणी राज्यों को भी अतिरिक्त सीटें मिलेंगी. उदाहरण से समझें तो तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 58-59 या केरल की 20 सीटें बढ़कर 30 हो जाएंगी. कोई राज्य बिल्कुल नहीं घटेगा.
- बेहतर प्रशासन और विकास: छोटे क्षेत्रों में सांसद ज्यादा फोकस कर सकेंगे और स्थानीय मुद्दे बेहतर सुलझेंगे.
सवाल 2: तो क्या बड़ी लोकसभा के नुकसान भी हैं?
जवाब: फायदों की तरह बड़ी लोकसभा के 5 नुकसान भी हैं…
- बहुत ज्यादा खर्च: संसद की एक दिन की बैठक में पहले ही 8-9 करोड़ रुपये खर्च होते हैं. 850 सांसदों के साथ यह खर्च रोजाना करीब 3 करोड़ रुपये और बढ़ सकता है. सालाना अतिरिक्त खर्च 1,171 करोड़ रुपये (सिर्फ संसद के लिए) हो जाएगा. राज्य विधानसभाओं में भी 4,000 नए सदस्य जोड़ने से कुल 5,000-8,000 करोड़ रुपये सालाना अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.
- उत्तर-दक्षिण का विभाजन बढ़ेगा: अगर शुद्ध जनसंख्या आधार पर हुआ तो तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों का कुल शेयर 24.3% से घटकर 20.7% रह सकता है. उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश और बिहार का शेयर 38.1% से 43.1% हो जाएगा. दक्षिण कह रहा है कि उन्होंने परिवार नियोजन किया, फिर भी सजा मिल रही है.
- संसद का कामकाज प्रभावित: 850 सदस्यों वाला सदन पहले से ज्यादा शोर-शराबा वाला और अनियंत्रित हो सकता है. बहस लंबी चलेगी और फैसले लेना मुश्किल होगा.
- राजनीतिक हेरफेर का खतरा: परिसीमन आयोग की सीमाएं तय करते वक्त पैकिंग-क्रैकिंग-स्टैकिंग जैसी तकनीकें इस्तेमाल हो सकती हैं, जैसा असम 2023 में हुआ. विपक्ष इसे ‘gerrymandering’ बता रहा है.
- संघीय ढांचे पर असर: दक्षिण राज्यों के मुख्यमंत्रियों का कहना है कि यह संघीय सिद्धांत को कमजोर करेगा और उत्तर को ज्यादा ताकत देगा.
सवाल 3: क्या सरकार का 50% बढ़ोतरी वाला फॉर्मूला इन नुकसानों को दूर कर देगा?
जवाब: गृह मंत्री अमित शाह और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने आश्वासन देते हुए कहा है कि हर राज्य को मौजूदा अनुपात में 50% बढ़ोतरी मिलेगी. यानी कोई राज्य नुकसान में नहीं आएगा, लेकिन विधेयकों के ड्राफ्ट में यह शब्द साफ नहीं लिखा है, इसलिए विपक्ष चिंतित है. अगर परिसीमन 2011 जनगणना के शुद्ध आंकड़ों पर हुआ तो दक्षिण का प्रतिशत घट सकता है.
सवाल 4: आम आदमी के लिए इसका मतलब क्या है? लोकतंत्र मजबूत होगा या कमजोर?
जवाब: एक्सपर्ट्स इस पर दो बातें कहते हैं- फायदे और नुकसान की.
- फायदे की बात: ज्यादा सीटें यानी ज्यादा प्रतिनिधित्व और बेहतर लोकतंत्र. महिलाओं की आवाज मजबूत होगी और जनसंख्या के हिसाब से न्याय होगा.
- नुकसान की बात: खर्च बढ़ेगा, उत्तर-दक्षिण तनाव बढ़ेगा और संसद का प्रभाव कम हो सकता है. अगर सही तरीके से लागू हुआ तो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होगी, लेकिन अगर राजनीतिक चाल बनी तो संघीय भावना कमजोर पड़ेगी.
अगर लोकसभा के विशेष सत्र में बिल पास हो गए तो परिसीमन आयोग बनेगा. नई सीटें और महिला आरक्षण 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू होंगे. आरक्षण 15 साल के लिए होगा.



