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भारतीयों को नहीं होगी गैस की किल्लत, सरकार ने चलाया ECA का ब्रह्मास्त्र, जानें क्या है ये?

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पश्चिम एशिया की जंग भारत की रसोई पर दस्तक दे रही है. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद, एलपीजी टैंकर फंसे और फिर सरकार को मजबूरन निकालना पड़ा वो कानून जो ऑयल सेक्टर में बेहद कम इस्तेमाल होता है. सरकार ने 5 मार्च 2026 को एसेंशियल कॉमोडिटीज एक्ट, 1955 यानी ECA लागू किया.

पेट्रोलियम एंड नैचुरल गैस मिनिसट्री ने देश की सभी ऑयल रिफाइनरियों को आदेश दिया कि प्रोपेन और ब्यूटेन का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ एलपीजी बनाने में हो. पेट्रोकेमिकल्स के लिए इन्हें इस्तेमाल करना अब बंद और जो एलपीजी बने वो सिर्फ IOC, BPCL, HPCL को मिले ताकि 33 करोड़ से ज्यादा घरों तक कुकिंग गैस पहुंचती रहे.

ECA है क्या और इसे क्यों ‘ब्रह्मास्त्र’ कहते हैं?
साल 1955 में संसद ने यह कानून पास किया था. इसके तहत सरकार को अधिकार है कि किसी भी जरूरी चीज का उत्पादन, स्टॉक, बिक्री और कीमत- सब अपने हाथ में ले ले. पेट्रोलियम और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स इसमें शुरू से ही शामिल हैं.

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ऑयल सेक्टर में ECA का यह इस्तेमाल बेहद कम होता है. इससे पहले 2022 में रूस-यूक्रेन वॉर के वक्त रिफाइनर्स को एक्सपोर्ट रोकने और डॉमेस्टिक सप्लाई बनाए रखने के लिए इसे लागू किया गया था, लेकिन इस तरह का सीधा प्रोडक्शन ऑर्डर LPG के लिए बेहद दुर्लभ है. यही इसे इतना बड़ा सिग्नल बनाता है.

भारत में हर साल तीन करोड़ 13 लाख टन LPG की खपत होती है. इसमें से सिर्फ एक करोड़ 28 लाख टन देश में बनती है- यानी करीब 58 प्रतिशत इंपोर्ट है और उस इंपोर्ट का 85-90 प्रतिशत हिस्सा स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से होकर आता है.

जब यह रास्ता बंद हुआ तो LPG टैंकर्स रुक गए. सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारत के पास इस वक्त करीब 25-30 दिन का LPG बफर है. ऊपर से कतर की LNG फैसिलिटी ड्रोन और मिसाइल हमलों में नष्ट हो गई जिसके बाद पेट्रोनेट एलएनजी ने कतर की सप्लाई पर फोर्स मैजर की घोषणा कर दी.

इंडस्ट्री पर असर
ECA ऑर्डर का सबसे बड़ा केमिकल इंडल्ट्री को लगा है. प्रोपेन और ब्यूटेन पेट्रोकेमिकल्स के लिए बंद होने से OPaL का दहेज प्लांट प्रोडक्शन डिसरप्शन में है. GAIL ने भी फोर्स मेजर नोटिस जारी किया है. घरेलू सिलेंडर की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं. दिल्ली में 14.2 किलोग्राम सिलेंडर 853 रुपये से 913 रुपये हो गया है. कमर्शियल सिलेंडरों की की किल्लत अलग है.

ब्रेंट क्रूड 92 रुपये के पार है और जानकार कह रहे हैं कि जंग लंबी चली तो राहत अस्थाई साबित हो सकती है. अभी हाउसहोल्ड एलपीजी सरकार की प्राथिमकता है. कमर्शियल सप्लाई का इंतजार करना पड़ सकता है, लेकिन जब 1955 का कानून निकालना पड़े, जब फोर्स मेडर लगे, जब रिफाइनरियों को आदेश आए तो यह सिर्फ पश्चिम एशिया की जंग नहीं है.

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