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डिजिटल डेटा कानून की धाराओं को चुनौती, दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

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दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से उसका पक्ष स्पष्ट करने को कहा है. जिसमें डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 की कई धाराओं की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं. अदालत ने केंद्र को नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में तय की है. दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि मामले में उठाए गए मुद्दे महत्वपूर्ण हैं. इसलिए केंद्र सरकार से जवाब जरूरी है.

याचिका में DPDPA की संवैधानिक वैधता पर सवाल

दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में दावा किया गया है कि कानून की धारा 17, 18, 19, 20, 21, 23, 29, 30, 36, 37, 39, 40 और 44 सरकार को नागरिकों के निजी डेटा तक अत्यधिक और बिना पर्याप्त निगरानी के पहुंच देती हैं. याचिकाकर्ता के अनुसार इन प्रावधानों के कारण बिना सुनवाई के ऑनलाइन सामग्री ब्लॉक करने की शक्ति मिलती है, लोगों की सहमति का वास्तविक महत्व कम हो जाता है और कई मामलों में पारदर्शिता की कमी बनी रहती है. 

याचिका में यह भी कहा गया कि कानून सूचना का अधिकार  व्यवस्था को कमजोर करता है और डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड और अपीलीय ट्रिब्यूनल पर कार्यपालिका का अत्यधिक नियंत्रण स्थापित करता है. इससे स्वतंत्र और निष्पक्ष नियामक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है.

यह कानून सविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है: याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह कानून सरकार को व्यापक निगरानी (सर्विलांस) की शक्ति देता है, जिससे नागरिकों का निजी और व्यवहार संबंधी डेटा लंबे समय तक संग्रहित किया जा सकता है. साथ ही कई स्थितियों में बिना सहमति या पर्याप्त जानकारी के व्यक्तिगत डेटा हासिल करने की व्यवस्था भी मौजूद है. 

याचिका में कहा गया है कि ये प्रावधान संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों बराबरी का अधिकार, निजता का अधिकार, सूचना पर नियंत्रण (इंफॉर्मेशनल ऑटोनॉमी), अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष प्रक्रियाका उल्लंघन करते हैं. साथ ही शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक सिद्धांतों को भी कमजोर करते हैं. 

दिल्ली हाई कोर्ट से कुछ धाराओं को असंवैधानिक घोषित कर रद्द करने की मांग 

याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की है कि विवादित धाराओं को असंवैधानिक घोषित कर रद्द किया जाए या फिर संविधान के अनुरूप सीमित तरीके से लागू किया जाए ताकि नागरिकों की निजता और अधिकारों की उचित सुरक्षा हो सके. अब इस  मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में होगी.

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