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बेअंत सिंह मर्डर केस में दोषी बलवंत सिंह राजोआना ने की मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलने की अपील, SC ने एक महीने के लिए टाल दी सुनवाई

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पूर्व पंजाब सीएम बेअंत सिंह की हत्या मामले में मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदलने के दोषी बलवंत सिंह राजोआना के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट 18 मार्च को सुनवाई करेगा. बुधवार (18 फरवरी, 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने बलवंत सिंह राजोआना की अपील सुनी, जिसमें उसने दया याचिका पर निर्णय में देरी के कारण उसके मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलने का अनुरोध किया है.

बलवंत सिंह राजोआना 29 सालों से ज्यादा समय से जेल में बंद है, जिनमें से 15 सालों से ज्यादा समय वह मृत्युदंड की सजा पाए कैदी के तौर पर गुजार चुका है. केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच को बताया कि उन्हें इस मामले में कुछ समय चाहिए.

बलवंत सिंह राजोआना की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट के 24 सितंबर 2025 के आदेश का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि प्रतिवादियों की ओर से स्थगन के लिए आगे किसी भी अनुरोध पर विचार नहीं किया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘मामले की सुनवाई 18 मार्च को होगी.’ सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले केंद्र सरकार से बलवंत राजोआना की दया याचिका पर निर्णय लेने को कहा था. केंद्र ने तब मामले की संवेदनशीलता का हवाला देते हुए कहा था कि दया याचिका विचाराधीन है.

सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने बलवंत सिंह राजोआना की याचिका पर केंद्र, पंजाब सरकार और चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन से जवाब मांगा था. पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और 16 अन्य लोग 31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ में सिविल सचिवालय के प्रवेश द्वार पर हुए विस्फोट में मारे गए थे. एक विशेष अदालत ने जुलाई 2007 में बलवंत सिंह राजोआना को मौत की सजा सुनाई थी.

बलवंत सिंह राजोआना ने अपनी रिहाई के लिए निर्देश देने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी. सुप्रीम कोर्ट ने तीन मई 2023 को उसकी मृत्युदंड की सजा को कम करने से इनकार कर दिया और कहा कि सक्षम प्राधिकारी उसकी दया याचिका पर विचार कर सकता है.

अपनी नई याचिका में बलवंत सिंह राजोआना ने कहा कि उसने 28.8 वर्ष जेल में बिताए हैं, जिनमें से 15 साल से अधिक समय मृत्युदंड के कैदी के रूप में व्यतीत किए गए हैं.

याचिका में कहा गया कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने मार्च 2012 में अनुच्छेद 72 के तहत दया याचिका प्रस्तुत कर उसकी ओर से क्षमादान की गुहार लगाई थी. याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से सक्षम प्राधिकारी को उचित समय में उसकी ओर से दायर दया याचिका पर विचार करने और आगे का निर्णय लेने का निर्देश दिए जाने के बाद से एक साल से ज्यादा समय बीत चुका है.

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