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यादों के झरोखे में नॉर्थ और साउथ ब्लॉक, जहां कभी देश की तकदीर लिखी जाती थी!

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हर उरूज को ज़वाल है… यूं तो ये फ़िक़रा ज़बान-ए-ज़द-ए-आम (हरेक की ज़बान पर) है, जो हमें याद दिलाता रहता है कि इस दुनिया में हर उरूज को ज़वाल है… यानी हर ऊंचाई का पतन निश्चित है.

अभी चंद साल ही गुज़रे हैं, जब देश का काउंसिल हाउस, जिसे हम अब पुराने संसद भवन के तौर पर याद करते हैं, इतिहास का हिस्सा बन चुका है. करीब 75 सालों तक यह आज़ाद भारत की जनता की महापंचायत का केंद्र रहा, जहां देश को दिशा देने वाले कानून बने और हर समस्या के समाधान पर बहसें हुईं. गौरवशाली वर्तमान का अतीत में बदलना एक सतत प्रक्रिया है.

यादों के झरोखे में नॉर्थ और साउथ ब्लॉक

इसी क्रम में नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक भी इतिहास के नए सफर का हिस्सा बन रहे हैं. प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक साउथ ब्लॉक प्रधानमंत्री कार्यालय का केंद्र रहा. नॉर्थ ब्लॉक में वित्त और गृह मंत्रालय के कार्यालय रहे हैं, जबकि साउथ ब्लॉक में विदेश मंत्रालय स्थित रहा है.

दिलचस्प बात यह है कि जहां नई दिल्ली के वास्तुकार के तौर पर एड्विन लुटियन को याद किया जाता है, वहीं साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक का डिज़ाइन हर्बर्ट बैकर ने तैयार किया था. उन्होंने एक जैसी संरचना वाले दो भवन डिज़ाइन किए, जो ब्रिटिश शासन के प्रशासनिक कार्यालय थे. ये भवन कर्तव्य पथ के दोनों ओर वायसराय हाउस (राष्ट्रपति भवन) के निकट बनाए गए.

लुटियन की तरह बैकर ने भी वायसराय की इच्छा का सम्मान करते हुए सचिवालयों के डिज़ाइन में मुग़ल वास्तुकला के तत्व शामिल किए, जैसे लाल बलुआ पत्थर, उठा हुआ चबूतरा और प्रवेश द्वारों की बनावट, जो हुमायूं के मक़बरे (निज़ामुद्दीन, नई दिल्ली) से प्रेरित थी.

जब बैकर और लुटियन की दोस्ती टूटी

बैकर ने दोनों सचिवालय भवनों को ऊंचे चबूतरे पर बनाने और उनके बीच की जगह समतल रखने की योजना बनाई. लुटियन इससे सहमत नहीं थे, क्योंकि उनका मानना था कि इससे वायसराय हाउस, यानी आज के राष्ट्रपति भवन, की ओर जाने वाली ढलान भवन के दृश्य को आंशिक रूप से ढक देगी. आखिरकार बैकर की योजना पर अमल हुआ. नतीजा यह है कि पहाड़ी पर चढ़ते समय ढलान के निचले हिस्से में राष्ट्रपति भवन का गुंबद ओझल हो जाता है और शीर्ष के करीब पहुंचने पर फिर दिखाई देता है.

ढलान को लेकर उत्पन्न विवाद ने एक गहरी और भरोसेमंद दोस्ती का अंत कर दिया. बैकर ने इसे “मेरी पूरी ज़िंदगी के कार्य का सबसे दुखद पहलू” कहा था. लुटियन हल्की ढलान चाहते थे ताकि भवन हर समय दृष्टिगोचर रहे, लेकिन बैकर के आग्रह पर अपेक्षाकृत गहरी ढलान बनाई गई. यह प्रसंग लुटियन के लिए भारत की कड़वी यादों में शामिल हो गया.

तो वो यादें ताजा हो गई…

आज जब, नए इतिहास की इबारत लिखी जा रही है तो वो यादें ताजा हो गई, जब 13 फरवरी 1931 को अंग्रोजी सरकार ने नई राजधानी का औपचारिक उद्घाटन किया और ये इमारतें प्रशासनिक व्यवस्था के केंद्र के रूप में स्थापित हुईं. लंबे समय तक यहीं से देश की नीतियां बनीं और शासन की दिशा तय हुई. यहीं देश की तकदीर के लिखने काम हुआ.

आज चीज़ें बदल गई हैं. अब ये इमारतें तकदीर लिखने का नहीं बल्कि तकीर को सहेजने के तौर पर याद की जाएंगी. अब इन इमारतों को संग्राहलय के तौर पर तब्दील किया जा रहा है.

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