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Supreme Court: कर्नाटक की दरगाह में महाशिवरात्रि पूजा रोकने के मांग सुप्रीम कोर्ट ने नहीं सुनी, कमेटी ने वापस ली याचिका

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कर्नाटक के कलबुर्गी के लाडले मशायक दरगाह में महाशिवरात्रि की पूजा रोकने की मांग सुप्रीम कोर्ट ने नहीं सुनी. जस्टिस दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने इस बात पर सवाल उठाया कि यह याचिका सीधे सुप्रीम कोर्ट में क्यों दाखिल की गई. कोर्ट के रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता खलील अंसारी के वकील ने याचिका वापस ले ली.

अंसारी ने यह याचिका दरगाह कमेटी की तरफ से बतौर सचिव दाखिल की थी. कमेटी ने मांग की थी कि दरगाह परिसर में पूजा की अनुमति न दी जाए. उसका कहना था कि इसके ज़रिए दरगाह के धार्मिक स्वरूप को बदलने की कोशिश की जा रही है. याचिकाकर्ता का दलील थी कि पिछले कुछ सालों में हाई कोर्ट के आदेश से वहां शिवरात्रि पर पूजा हो रही है. इसके अलावा भी कोर्ट से अलग-अलग अंतरिम आदेश हासिल कर जगह का स्वरूप बदलने की कोशिश हो रही है.

चीफ जस्टिस ने क्या की टिप्पणी?

बुधवार को जब मामला चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने रखा गया, तब भी जजों ने याचिका के सीधे सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने पर सवाल उठाया था. चीफ जस्टिस ने कहा था, ‘आजकल हर मामला सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट क्यों आ रहा है? इससे ऐसा संदेश जाता है जैसे हाई कोर्ट निष्क्रिय हो गए हैं.’ अब मामले की सुनवाई करने वाली बेंच ने भी कहा है कि याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट में अपनी बात रखनी चाहिए.

​क्या है विवाद?

​अलंद दरगाह भी कही जाने वाली यह जगह 14वीं सदी की के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी से जुड़ी बताई जाती है. वहीं हिंदू पक्ष इसे 15वीं सदी के संत राघव चैतन्य से जुड़ा बताते हैं. परिसर में एक शिवलिंग भी है जिसे राघव चैतन्य शिवलिंग कहा जाता है. 2022 में यहां पूजा के अधिकार को लेकर सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. 2025 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने कड़ी सुरक्षा के बीच 15 लोगों को दोपहर 2 से 6 बजे तक पूजा की अनुमति दी थी.

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