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इस बार खास होगी गणतंत्र दिवस परेड, पहली बार दिखाई देंगे भारतीय सेना के ‘मूक योद्धा’ जानें इनमें कौन-कौन शामिल

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गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) परेड की रिहर्सल इन दिनों राजधानी दिल्ली के कर्तव्य पथ पर शुरू हो गई है. ऐसे में इस बार कर्तव्य पथ पर एक खास और भावनात्मक दृश्य देखने को मिलेगा. भारतीय सेना के पशु-दस्ते, पहली बार इतने बड़े और संगठित रूप में परेड में शामिल होंगे. ये पशु न केवल सेना की ताकत दिखाएंगे, बल्कि यह भी बताएंगे कि देश की रक्षा में उनके योगदान को कितनी अहम जगह दी जाती है.

इस विशेष दस्ते में दो बैक्ट्रियन ऊंट, चार जांस्कर पोनी, चार शिकारी पक्षी (रैप्टर्स), भारतीय नस्ल के 10 सेना के कुत्ते और सेना में पहले से काम कर रहे 06 पारंपरिक सैन्य कुत्ते शामिल हैं.

बैक्ट्रियन कैमल
परेड में थलसेना के दस्ते की अगुवाई करेंगे बैक्ट्रियन ऊंट, जिन्हें हाल ही में लद्दाख के ठंडे रेगिस्तानी इलाकों में तैनात किया गया है. ये खास किस्म के ऊंट, लद्दाख और सेंट्रल एशिया के चुनिंदा इलाकों में ही पाए जाते हैं. वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर हुई गलवान झड़प के बाद इन खास उंटों को सेना की लॉजिस्टिक विंग का हिस्सा बनाया गया था. इसके लिए इन ऊंटों को खास मिलिट्री ट्रेनिंग दी गई है.

ये ऊंट बहुत ठंडे मौसम और 15 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर आसानी से काम कर सकते हैं. ये 250 किलो तक का सामान ढो सकते हैं और कम पानी-चारे में लंबी दूरी तय करते हैं. इससे सेना को दूरदराज और कठिन इलाकों में रसद पहुंचाने में बड़ी मदद मिलती है.

जांस्कर पोनी
बैक्ट्रियन ऊंटों के बाद कदम से कदम मिलाकर चलेंगी ज़ांस्कर पोनी, जो लद्दाख की एक दुर्लभ और स्वदेशी नस्ल हैं. आकार में छोटी होने के बावजूद इनमें जबरदस्त ताकत और सहनशक्ति होती है. ये पोनी माइनस (-) 40 डिग्री तापमान और बहुत ऊंचाई वाले इलाकों में 40 से 60 किलो वजन लेकर चल सकती हैं. साल 2020 से ये सियाचिन जैसे कठिन क्षेत्रों में सैनिकों के साथ सेवा दे रही हैं और कई बार एक दिन में 70 किलोमीटर तक गश्त करती हैं.

शिकारी रैप्टर्स
परेड में शामिल चार शिकारी पक्षी (रैप्टर्स), सेना की नई और स्मार्ट सोच को दिखाते हैं. इनका इस्तेमाल निगरानी और एंटी-ड्रोन यानी हवाई सुरक्षा से जुड़े कामों में किया जाता है, जिससे सेना के अभियान ज्यादा सुरक्षित बनते हैं.

के9 दस्ता
इस परेड का सबसे भावुक हिस्सा होंगे भारतीय सेना के कुत्ते, जिन्हें प्यार से “मूक योद्धा” कहा जाता है. इन कुत्तों को मेरठ स्थित सेना के रिमाउंट एंड वेटरनरी कॉर्प्स केंद्र में प्रशिक्षित किया जाता है. ये आतंकवाद विरोधी अभियानों, विस्फोटक और बारूदी सुरंगों की पहचान, खोज-बचाव कार्यों और आपदा राहत में सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं. कई बार इन कुत्तों ने अपनी जान की परवाह किए बिना सैनिकों की जान बचाई है.

आत्मनिर्भर भारत के तहत सेना अब मुधोल हाउंड, रामपुर हाउंड, चिप्पीपराई, कोम्बई और राजापलायम जैसी भारतीय नस्लों के कुत्तों को भी बड़े स्तर पर शामिल कर रही है. यह भारत की अपनी क्षमताओं पर बढ़ते भरोसे का साफ संकेत है.

गणतंत्र दिवस 2026 पर जब सेना का एनिमल-कंटीनजेंट पशु कर्तव्य पथ से गुजरेगा, तब वे यह याद दिलाएंगे कि देश की रक्षा सिर्फ हथियारों से नहीं होती. सियाचिन की बर्फीली चोटियों से लेकर लद्दाख के ठंडे रेगिस्तान तक, इन पशुओं ने चुपचाप लेकिन मजबूती से अपना फर्ज निभाया है. ये सिर्फ सहायक नहीं हैं, बल्कि भारतीय सेना के सच्चे साथी और चार पैरों पर चलने वाले वीर योद्धा हैं.

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