उत्तराखंड के उन परिवारों के लिए पिछले कुछ दिन खुशियों की नई सौगात लेकर आए हैं, जिन्होंने दशकों का समय एक अजनबी की पहचान के साथ गुजारा था. नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के लागू होने के बाद, प्रदेश में रह रहे 162 शरणार्थियों के लिए अब अपनी जड़ों से जुड़ने का कानूनी रास्ता साफ हो गया है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लंबी जांच-पड़ताल के बाद इन सभी के नागरिकता आवेदनों को हरी झंडी दे दी है.
एक लंबा इंतजार और नई पहचान
यह केवल कागजों का बदलाव नहीं है, बल्कि उन 156 लोगों के जीवन का एक नया अध्याय है जो वर्षों से भारत को अपना घर तो मानते थे, लेकिन तकनीकी रूप से यहां के नागरिक नहीं थे. इनमें मुख्य रूप से पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए हिंदू और सिख परिवार शामिल हैं.
तालिबान के खौफ से शांति की शरण तक
इन शरणार्थियों की कहानियां संघर्ष और साहस की मिसाल हैं. सीमा जागरण मंच के सदस्य कर्नल (सेनि.) अजय कोठियाल के अनुसार, इन लाभार्थियों में 7 ऐसे हिंदू और सिख शामिल हैं जो करीब 34 साल पहले अफगानिस्तान में तालिबान के बढ़ते जुल्मों के कारण अपना घर-बार छोड़कर भारत आए थे. वहीं, 149 शरणार्थी पाकिस्तान से हैं, जिनमें से कई परिवार तो विभाजन की विभीषिका झेलते हुए तभी से उत्तराखंड के अलग-अलग कोनों में बस गए थे.
प्रयासों को मिली सफलता
वर्ष 2020 में बने CAA को इस साल मार्च में देशव्यापी स्तर पर प्रभावी किया गया, जिसके बाद प्रक्रिया में तेजी आई. इन परिवारों को अधिकार दिलाने में ‘सीमा जागरण मंच’ और ‘हिंदू जागरण मंच’ जैसे संगठनों ने सेतु का काम किया. स्थानीय स्तर पर दस्तावेजों को जुटाने से लेकर उन्हें गृह मंत्रालय तक पहुंचाने और तकनीकी अड़चनों को दूर करने में इन संगठनों की भूमिका अहम रही.
एक सुरक्षित भविष्य की उम्मीद
नागरिकता मिलने का सीधा अर्थ है—अब ये लोग सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकेंगे, संपत्ति खरीद सकेंगे और सबसे महत्वपूर्ण, बिना किसी डर या संकोच के गर्व से खुद को भारतीय कह सकेंगे. उत्तराखंड के सीमांत इलाकों और राजधानी देहरादून में रह रहे इन परिवारों के लिए यह किसी पुनर्जन्म से कम नहीं है.



