Ideas of India Summit 2026: ABP Group के चीफ एडिटर अतिदेब सरकार ने शुक्रवार को ‘आइडियाज ऑफ इंडिया 2026’ समिट की शुरुआत की. उन्होंने दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था में तेजी से हो रहे बदलावों का जिक्र करते हुए कहा कि नई विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका बेहद अहम है. अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा, “लेडीज़ एंड जेंटलमैन, आइडियाज ऑफ इंडिया 2026 में आपका स्वागत है. पिछले साल हमने इंसानियत के एक नए दौर की झलक देखी, लेकिन उसके बाद से दुनिया संघर्ष में फंसी हुई है.”
चीफ एडिटर ने कहा कि युद्ध हमारे क्षेत्र तक पहुंच चुका है. व्हाइट हाउस ने टैरिफ लगाकर वैश्विक व्यापार को झटका दिया, हालांकि बाद में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को रद्द कर दिया. भारत ने यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत की है. भारत में किसान संगठन अमेरिका के साथ संभावित समझौते का विरोध कर रहे हैं. गाजा में अब भी हालात खराब हैं. वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन हुआ है. ईरान में तनाव बना हुआ है. यूक्रेन में युद्ध खत्म करने की कई कोशिशें अब तक शांति नहीं ला सकी हैं. उन्होंने साफ कहा कि वैश्विक राजनीति में शांति अपने आप नहीं आती.
किसिंजर का वर्ल्ड ऑडर पर नजरिया
अतिदेब सरकार ने 2014 में दिए गए हेनरी किसिंजर (Henry Kissinger) के विचारों का जिक्र किया. हेनरी किसिंजर ने कहा था कि दुनिया को एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जिसमें तय नियम हों और हर देश की सीमा तय हो कि वह क्या कर सकता है और क्या नहीं. यह व्यवस्था देशों की मान्यता और ताकत के संतुलन से चलनी चाहिए, वरना दुनिया अराजकता की ओर बढ़ेगी.
चीफ एडिटर ने बताया कि 1648 में हुई Peace of Westphalia के बाद यूरोप में जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनी, वह देशों की संप्रभुता, एक-दूसरे के मामलों में दखल न देने और ताकत के संतुलन पर आधारित थी. बाद में यही व्यवस्था दुनिया के कई हिस्सों में लागू हुई, लेकिन तकनीक के बदलाव, दुनिया के ज्यादा जुड़ने और अलग सोच रखने वाले देशों के उभरने से यह व्यवस्था चुनौती में आ गई. यूरोप में हालात ऐसे हो गए कि एक साझा व्यवस्था उसकी मुद्रा और सीमाओं को नियंत्रित करने लगी.
रूस, अमेरिका और चीन की भूमिका पर कही ये बात
अतिदेब सरकार ने कहा कि रूस आज भी यूरोप के लिए एक पहेली बना हुआ है. उसने इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा युद्ध किए, लेकिन किसी एक देश को पूरे यूरोप पर हावी होने से भी रोका. अमेरिका के बारे में उन्होंने कहा कि वहां दो धाराएं रही हैं. एक आदर्शवादी सोच, जो दुनिया में लोकतांत्रिक मूल्यों को फैलाना चाहती है. दूसरी यथार्थवादी सोच, जो राष्ट्रीय हित और ताकत के संतुलन को प्राथमिकता देती है. चीन की सोच अलग रही है. वहां की व्यवस्था के अनुसार दुनिया में एक तरह की श्रेणी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें दूसरे देश मध्य राज्य यानी चीन को सम्मान दें. किसिंजर का मानना था कि दुनिया को एक नई और स्थिर व्यवस्था बनानी होगी, जो आज की हकीकत के अनुसार हो और जिसे सभी देश स्वीकार करें.
नए वर्ल्ड ऑडर पर विशेषज्ञों की राय
चीफ एडिटर अतिदेब सरकार ने मौजूदा हालात को लेकर विशेषज्ञों की राय को भी रखा. विशेषज्ञ मोनिका डफी टॉफ्ट की राय को रखते हुए उन्होंने कहा, “अगर हालात दूसरे विश्व युद्ध के बाद जैसे हो जाएं तो दुनिया प्रभाव क्षेत्रों में बंट सकती है. यानी कुछ बड़े देश अलग-अलग क्षेत्रों पर असर बनाएंगे, भले ही वे सीधे शासन न करें. अमेरिका, रूस और चीन दुनिया को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में बांट सकते हैं. जॉन मियरशाइमर का मानना है कि चीन का उदय शांतिपूर्ण नहीं होगा. उनका कहना है कि अमेरिका एशिया में चीन का दबदबा कभी स्वीकार नहीं करेगा. ऐसे में प्रतिस्पर्धा और टकराव तय है.
उन्होंने आगे कहा, “यान ज़ुएतोंग ने भविष्यवाणी की है कि दुनिया में अमेरिका और चीन दो बड़ी शक्तियां बनेंगी क्योंकि चीन अर्थव्यवस्था, सेना और संस्कृति के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है. माइकल बेकले का तर्क है कि विश्व व्यवस्था फिलहाल ठहरी हुई है. जनसंख्या, उत्पादन और क्षेत्र विस्तार की रफ्तार सीमित हो चुकी है इसलिए कोई भी देश इतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ रहा कि वैश्विक संतुलन को पूरी तरह बदल दे. उत्पादकता के मामले में अमेरिका अब भी आगे है.”
अनिश्चित माहौल में भारत की जिम्मेदारी
अतिदेब सरकार ने कहा कि ऐसे अनिश्चित समय में भारत के नीति निर्माताओं के सामने बड़ी चुनौती है. अमेरिका जैसा अहम साथी अंदरूनी मामलों में उलझा दिखता है. पड़ोसी देश अस्थिर हैं. चीन के साथ रिश्तों में नरमी दिखती है, लेकिन पूरी भरोसेमंदी नहीं है. अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौते घरेलू सुधार की मांग करेंगे.
उन्होंने कहा कि भारत को अपने राष्ट्रीय हित पर मजबूती से ध्यान देना होगा. प्रधानमंत्री ने लक्ष्य तय किया है कि 2047 तक भारत विकसित राष्ट्र बने. यह आसान नहीं है. दुनिया की अर्थव्यवस्था धीमी है. महामारी के बाद लोग कम बचत कर रहे हैं. अडानी और रिलायंस को छोड़ दें तो बाकी भारतीय कंपनियां ज्यादा निवेश नहीं कर रहीं. युवाओं के लिए रोजगार अभी भी चुनौती है और कौशल की कमी भी है. इन हालात में प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि विकास ही असली राष्ट्रीय हित है.
भारत को क्या करना चाहिए?
चीफ एडिटर ने कहा कि भारत को आने वाले दो दशकों में ठोस आर्थिक प्रगति करनी होगी और साथ ही अपनी संप्रभुता की रक्षा भी करनी होगी. युद्ध भारत के हित में नहीं हैं. हमें उन देशों के साथ व्यापार बढ़ाना चाहिए जो हमारे सामान और सेवाएं खरीदते हैं. जो निवेशक यहां रोजगार देने को तैयार हैं, उनका स्वागत करना चाहिए. हालांकि अस्थिर क्षेत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा इसलिए संवेदनशील क्षेत्रों में रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी देशों के निवेश की जांच होनी चाहिए. बाकी क्षेत्रों में सरकार को यह पूछना चाहिए कि हम आपकी यहां स्थापना में कैसे मदद कर सकते हैं? यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौता पूंजी और तकनीक लाने का मौका है, जिससे रोजगार बढ़ेंगे. अमेरिका के साथ समझौते पर फैसला करने से पहले वहां की स्थिति साफ होने का इंतजार करना चाहिए.
उन्होंने आगे कहा कि भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ निष्पक्ष, मजबूत और शांत तरीके से व्यवहार करना चाहिए. बड़ी शक्तियों के साथ भी संतुलन रखना चाहिए, किसी को धमकी नहीं देनी चाहिए. जैसा कि कभी चीनी नेताओं ने अपने राजनयिकों से कहा था कि शांत रहकर काम पूरा करो.
क्या भारत को महाशक्ति बनना जरूरी है?
आखिर में अतिदेब सरकार ने कहा कि जब विश्व व्यवस्था बदल रही है, तब भारत को अपनी संप्रभुता की रक्षा करते हुए ठोस आर्थिक प्रगति करनी होगी. सवाल यह है कि क्या इसके लिए भारत को महाशक्ति बनना जरूरी है या विकास ही उसका असली लक्ष्य होना चाहिए?



