प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों और समर्थकों के साथ पुलिस के बल प्रयोग का मसला उठाने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने नहीं सुनी. कोर्ट ने कहा है कि कानून-व्यवस्था राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती है. याचिकाकर्ता संबंधित ऑथोरिटी के सामने अपनी बात रख सकता है.
माघ मेले के दौरान 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के मौके पर संगम में स्नान के लिए जा रहे अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों पर पुलिस ने बल प्रयोग किया था. पुलिस का दावा है कि अविमुक्तेश्वरानंद पैदल चलने की बजाय अपनी पालकी पर ही स्नान के लिए जाना चाहते थे. इससे रोकने पर उनके शिष्य पुलिसकर्मियों से भिड़ गए. इसी के बाद बलप्रयोग किया गया.
इस घटना के बाद धरने पर बैठे अविमुक्तेश्वरानंद को माघ मेला प्रशासन ने एक नोटिस भी भेजा था. इसमें पूछा गया था कि वह खुद को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य क्यों बताते हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस पद पर अभिषेक पर रोक लगा रखी है. इस नोटिस को लेकर भी उनके समर्थक काफी नाराजगी जताते रहे हैं.
उज्ज्वल गौड़ नाम के वकील ने मामले में याचिका दायर करते हुए धार्मिक मामलों में प्रशासन के हस्तक्षेप का विरोध किया था. उन्होंने इस तरह के आयोजनों के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने की भी मांग की थी. साथ ही, माघ मेला प्रशासन की तरफ से अविमुक्तेश्वरानंद को भेजे गए नोटिस को भी गलत बताया था.
सोमवार, 16 फरवरी को मामला चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच में सुनवाई के लिए लगा, लेकिन जजों ने इसे सुनने से मना कर दिया. बेंच ने कहा कि कानून-व्यवस्था का विषय राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है. अगर याचिकाकर्ता को कोई बात कहनी है, तो वह संबंधित अथॉरिटी को ज्ञापन दे सकता है. इस मामले में कोर्ट दखल नहीं देगा.
यह भी पढ़ें:-
ममता बनर्जी के अफसरों पर चुनाव आयोग का डंडा, SIR में लापरवाही को लेकर 7 अधिकारी किए सस्पेंड



