क्या आप जानते हैं कि आपकी निजी जिंदगी से जुड़ी जानकारी पर आपको कंट्रोल करता है व्हाट्सएप? सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप की पैरेंट कंपनी मेटा के डर्टी गेम और भारत की प्राइवसी के बड़े सवाल पर सीनियर साइबर सिक्योरिटी वकील पवन दुग्गल ने कहा कि आज लगभग व्हाट्सएप हर भारतीय के मोबाइल में हैं. करोड़ों की संख्या में भारतीय इसी एक ऐप के जरिए चैट, कॉल, फोटो-वीडियो शेयर सब कुछ करते हैं, पर अब एक बार फिर सवाल उठे है कि व्हाट्सएप जो हमें फ्री सर्विस दे रहा है, क्या वो बदले में हमारी निजी जिंदगी से जुड़ा डाटा इकट्ठा कर रहा है? क्या हमारी बातें, हमारी पसंद-नापसंद, हमारी जरूरतें – सब मेटा तक पहुंच रही हैं?
बीते दिन सुप्रीम कोर्ट में व्हाट्सएप और मेटा की प्राइवसी पॉलिसी को लेकर जो सवाल उठे, एबीपी न्यूज ने उसकी गहन पड़ताल की है कि क्या सच में व्हाट्सएप ऐसा कर रहा है और अगर हां तो कैसे? कोर्ट में भी यही सवाल उठा कि क्या यूजर को सच में पता है कि उसका डाटा कैसे और कहां इस्तेमाल हो रहा है? व्हाट्सएप-मेटा असल में क्या कर रहे हैं?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से जुड़ा है यूजर का डेटा
वरिष्ठ साइबर सिक्योरिटी वकील पवन दुग्गल ने कहा कि व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम- तीनों मेटा कंपनी के प्लेटफॉर्म हैं. आरोप ये हैं कि इन सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के बीच यूजर का डेटा किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है, मतलब आप व्हाट्सएप पर क्या देखते हैं, क्या शेयर करते हैं और किस तरह के कंटेंट में आपकी दिलचस्पी है? इसी आधार पर आपको फेसबुक और इंस्टाग्राम पर विज्ञापन और कंटेंट दिखाया जाता है. उन्होंने कहा कि लोगों का अनुभव ये है कि आप किसी चीज की बात करते हैं और थोड़ी देर बाद उसी से जुड़ा विज्ञापन आपके फोन पर दिखने लगता है.
सुप्रीम कोर्ट में उठा व्हाट्सएप की प्राइवसी पॉलिसी का मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट में व्हाट्सएप की प्राइवसी पॉलिसी को लेकर यह मुद्दा उठा कि आम यूजर के पास असल में कोई विकल्प नहीं है. या तो शर्तें मानो या ऐप छोड़ दो. इस पर कोर्ट ने कहा कि इस तरह की पॉलिसी आम लोगों को भ्रमित करती है और उनकी प्राइवेसी के अधिकार पर असर डालती है.
कोर्ट में इस बात का उदाहरण भी सामने आया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले आम लोग- जैसे तमिलनाडु के ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाएं या छोटे दुकानदार – अंग्रेजी या कानूनी भाषा में लिखी गई लंबी प्राइवसी पॉलिसी को कैसे समझेंगे? ऐसे यूज़र बस ‘Agree’ बटन दबा देते हैं, बिना यह जानें कि वे किन शर्तों पर अपनी जानकारी शेयर करने की इजाजत दे रहे हैं. यही वजह है कि कोर्ट ने कहा कि बड़ी टेक कंपनियां आम लोगों की मजबूरी का फायदा नहीं उठा सकतीं.
डेटा पर ही टिका है मेटा का पूरा मॉडलः पवन दुग्गल
उन्होंने कहा, ‘मेटा का पूरा मॉडल ही डेटा पर टिका है. मेटा का बिजनेस मॉडल सीधा है. यूजर फ्री में ऐप इस्तेमाल करता है, बदले में उसका डेटा सिस्टम के अंदर जाता है उसी डेटा के आधार पर टार्गेटेड विज्ञापन चलते हैं यानी असल प्रोडक्ट आप हैं. इसमें आपकी आदतें, आपकी पसंद, आपकी जरूरतें शामिल हैं.’
उन्होंने कहा, ‘व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम फ्री हैं, लेकिन ये आपकी जानकारी से कमाई करते हैं. आप जो परमिशन देते हैं उसका मतलब सिर्फ ऐप चलाना नहीं, बल्कि अपनी जानकारी शेयर करना भी है. व्हाट्सएप के चैट और कॉल एंड टू एंड इंक्रिप्टेड होते हैं, यानी बीच में मेटा और व्हाट्सएप भी आपनके मैसेज या कॉल की बातों को देख या सुन नहीं सकता, यह कंपनी का आधिकारिक दावा है.’
ऐप के सुनने के सीधे सबूत नहीं, इसलिए कोर्ट में नहीं टिकता आरोपः दुग्गल
साइबर सिक्योरिटी वकील ने कहा, ‘फोन के माइक्रोफोन का एक्सेस व्हाट्सएप को तभी मिलता है, जब आप कॉल करते हैं, वॉइस नोट भेजते हैं या रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल करते हैं. व्हाट्सएप सुनता है, इसका कोई सीधा सबूत नहीं है, इसलिए कोर्ट में यह आरोप टिकता नहीं है, लेकिन फिर लोगों को क्यों लगता है कि व्हाट्सएप सुनता है? तो असली खेल समझिए. दरअसल, क्रॉस-एप डेटा शेयरिंग मेटा का इकोसिस्टम है. व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम, तीनों मेटा की ही कंपनियां हैं. आप फेसबुर या इंस्टाग्राम पर क्या लाइक करते हैं, क्या सर्च करते हैं, क्या वीडियो देखते हैं, तो उससे आपकी एक ऐड प्रोफाइल बनती है. फिर आप व्हाट्सएप पर किसी से उसी चीज का जिक्र कर देते हैं और थोड़ी देर बाद इंस्टाग्राम पर वही विज्ञापन दिख जाता है. लोग सोचते हैं, ‘अरे यार, बात की और तुरंत ऐड आ गया’. असल में ऐड माइक्रोफोन से नहीं, बल्कि आपके डिजिटल व्यवहार से आता है.’
उन्होंने कहा, ‘विदेश में तो दावा यह भी है कि आपके दोस्त किसी प्रोडक्ट को सर्च कर रहे हैं. आप उसी ग्रुप में हैं. Algorithms को लगता है कि शायद आपकी भी उसमें रुचि हो सकती है. इसलिए टार्गेटिंग आपके आसपास के लोगों के व्यवहार से भी होती है. वहीं, गूगल पर आपकी सर्च हिस्ट्री, यूट्यूब पर क्या देखते हैं, मैप्स पर आपकी लोकेशन, शॉपिंग ऐप्स पर क्या खरीद रहे हैं- ये सब मिलकर आपकी एक डिजिटल प्रोफाइल बना देते हैं.’
उन्होंने आगे कहा, ‘व्हाट्सएप पर हुई बातचीत बस एक coincidence लगती है, लेकिन डेटा पहले से ही सिस्टम के पास मौजूद होता है. सुप्रीम कोर्ट में उठा सवाल सिर्फ कानूनी नहीं आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा है.
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