राज्य की वित्तीय जरूरतें पूरा करने के लिए प्रदेश सरकारें अब पहले से ज्यादा कर्ज पर निर्भर होती जा रही हैं. राज्य सरकारें लंबी अवधि के बॉन्ड जारी कर पैसा जुटा रही हैं. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की तरफ से जारी राज्य वित्त 2025-26 के बजटों की रिपोर्ट को लेकर कहा गया है कि राज्यों के कुल राजकोषीय घाटे (GFD) का करीब 76 प्रतिशत हिस्सा बाजार से उधारी के जरिए पूरा किया जाएगा.
रिपोर्ट में कहा गया है कि कई राज्यों का कर्ज स्तर चिंता का विषय बना हुआ है. मार्च 2024 में राज्यों का कर्ज घटकर जीडीपी के 28.1 प्रतिशत पर आ गया था, मार्च 2026 में चालू वित्तीय वर्ष की सामाप्ति पर यह फिर बढ़कर करीब 29.2 प्रतिशत होने का अनुमान है. मौजूदा समय में तमिलनाडु (1.23 लाख करोड़) और महाराष्ट्र (1.23 लाख करोड़) कर्ज लेने में टॉप पर हैं. मध्य प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों का कर्जा भी बढ़ा है.
साल 2024-25 में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की कुल बाजार उधारी बढ़कर 10.73 लाख करोड़ रुपये हो गई, जो साल 2023-24 में 10.07 लाख करोड़ रुपये थी. इस तरह वित्तीय वर्ष के आधार पर 6.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.
किन राज्यों ने लिया ज्यादा लोन
पंजाब, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा और यूपी को छोड़कर बाकी सभी बड़े राज्यों ने 2024-25 में बाजार से ज्यादा कर्ज लिया. उत्तर प्रदेश की उधारी में इस दौरान बड़ी गिरावट दर्ज की गई. यूपी ने साल 2023-24 में 49,618 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था, जो बीते वित्तीय वर्ष में घटकर 4500 करोड़ रहा. इसी तरह से बिहार का का कर्ज 47,612 करोड़ से घटकर 47,546 करोड़ रहा है. उत्तराखंड का कर्ज काफी बढ़ा है, जो 6300 करोड़ से बढ़ाकर 10,400 करोड़ हो गया है.
लंबी अवधि के बॉन्ड जारी कर रहे राज्य
2024-25 में कुल 835 बार राज्य सरकारों के बॉन्ड जारी किए गए, जिनमें से 100 बार पुराने बॉन्ड दोबारा जारी किए गए. बता दें कि छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पुडुचेरी, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने री-इश्यू का सहारा लिया. रिपोर्ट से पता चलता है कि अब राज्य सरकारें पहले से लंबी अवधि के बॉन्ड जारी कर रही हैं. 2024-25 में 10 साल की अवधि वाले बॉन्ड का हिस्सा घटकर 14.5 प्रतिशत रह गया. बाकी बॉन्ड 35 साल की अवधि तक के थे.
केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों ने 20 साल से ज्यादा अवधि वाले बॉन्ड जारी किए हैं. मार्च 2025 के अंत तक कुल बकाया बॉन्ड में से 7.2 प्रतिशत की अवधि 20 साल से ज्यादा की थी. इसके पीछे एक कारण औसत ब्याज दर में गिरावट भी है.
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