उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में 4 साल की मासूम के साथ कथित बलात्कार और हत्या के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर और थाना प्रभारी को तलब किया है. बच्ची को दाखिल न करने वाले 2 निजी अस्पतालों को भी नोटिस जारी किया गया है. कोर्ट ने पूरे मामले को ‘बेहद परेशान करने वाला’ कहा है.
दिहाड़ी मजदूरी करने वाले बच्ची के पिता ने देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया है. उनकी तरफ से वरिष्ठ वकील एन. हरिहरन ने कोर्ट को बताया कि 16 मार्च को बच्ची के साथ अमानवीय क्रूरता की गई. वह अपने घर से 500 मीटर दूर झाड़ियों में मिली. इलाज के लिए ले जाए जाते समय वह जीवित थी. लेकिन एक के बाद एक 2 निजी अस्पतालों ने उसे भर्ती करने से मना कर दिया. आखिरकार, उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां उसे मृत घोषित किया गया.
वरिष्ठ वकील ने कहा कि इलाज के लिए ले जाते समय का बच्ची का वीडियो मौजूद है. उसे देख कर वह स्तब्ध रह गए. लेकिन निजी अस्पतालों ने कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई. उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने भी मामले में कोई गंभीरता नहीं दिखाई. पुलिस ने परिवार के साथ बदसलूकी की और घटना वाले दिन उनकी रिपोर्ट ही नहीं लिखी. अगले दिन यानी 17 मार्च को एफआईआर लिखी गई. उसमें भी शुरू में इसे सिर्फ हत्या का मामला लिखा गया.
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने पुलिस के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए. कोर्ट ने नोट किया कि जब पीड़ित परिवार पुलिस के पास गया, तो उनकी मदद करने की बजाय उनसे मारपीट की गई और चुप रहने को कहा गया. कोर्ट ने गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर और नंदग्राम थाने के प्रभारी को सोमवार, 13 अप्रैल को केस के मूल रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा.
ध्यान रहे कि घटना वाले दिन ही पुलिस ने 24 साल के आरोपी को गिरफ्तार कर लिया था. उसने बच्ची से दुष्कर्म के बाद ईंट से सिर पर वार कर उसकी हत्या की बात कबूल की थी. इस बात का सीसीटीवी फुटेज भी उपलब्ध है कि अपराध से पहले वह बच्ची को एक स्थानीय बाजार ले गया, जहां उसे खाने की कुछ चीजें दिलवाईं. पुलिस का कहना है कि 18 अप्रैल को आरोपी ने भागने की कोशिश की, इस दौरान हुई मुठभेड़ में उसके पैर पर गोली मारी गई.
कोर्ट ने पुलिस की गंभीरता पर संदेह जताने के साथ-साथ बच्ची का इलाज न करने वाले दोनों निजी अस्पतालों को भी आड़े हाथों लिया है. दोनों अस्पतालों को नोटिस जारी किया गया है. साथ ही, कोर्ट ने मीडिया और अधिकारियों को निर्देश दिया है कि पीड़िता और उसके परिवार की पहचान उजागर न की जाए.



