धार्मिक परंपराओं के पालन और महिला अधिकारों के बीच संतुलन पर मंगलवार को ऐतिहासिक सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने शुरू कर दी है. चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की बेंच के सामने पहले दिन सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बहस की. उन्होंने यह बताने का प्रयास किया कि हर धार्मिक स्थल के कुछ नियम होते हैं. उसमें एक सीमा तक ही दखल दिया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट जिस मामले को सुन रहा है वह केरल के सबरीमाला मंदिर में युवा महिलाओं के प्रवेश को लेकर शुरू हुआ था. भगवान अयप्पा के ब्रह्मचारी होने की मान्यता के चलते उनके इस मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के जाने पर रोक थी. 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे हटाने का फैसला दिया. केरल में इस फैसले का कड़ा विरोध हुआ. इसके चलते मामले में कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल हुईं. उन्हीं के आधार पर यह सुनवाई हो रही है.
सवाल सिर्फ सबरीमाला का नहीं!
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई की मुख्य वजह भले ही सबरीमाला फैसले की पुनर्विचार याचिकाएं हों, लेकिन इस सुनवाई में सीधे फैसले पर पुनर्विचार नहीं हो रहा है. यह सुनवाई 7 संवैधानिक सवालों पर है जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में तय किया था. यह सवाल सिर्फ इस मामले से नहीं जुड़े हैं. इनका संबंध मस्जिद में महिलाओं को नमाज पढ़ने की अनुमति न होने, गैर पारसी से शादी करने वाली पारसी लड़कियों को अग्यारी (पारसी अग्नि मंदिर) में प्रवेश से रोकने और
दाउदी वोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना जैसे कई मामलों से है.
कई मामलों को प्रभावित करेगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट का फैसला धार्मिक मान्यताओं और महिला अधिकारों से जुड़े सभी मामलों को सीधे प्रभावित करेगा. कोर्ट इस बात की समीक्षा कर रहा है कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में दिया गया धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार समानता, स्वतंत्रता और सम्मान जैसे मौलिक अधिकारों को किस हद तक बाधित कर सकता है.
ऐसे में 9 जजों की संविधान पीठ के सामने बहस की शुरुआत करते हुए दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस बात पर जोर दिया कि 2018 का सबरीमाला फैसला गलत तरीके से लिया गया था. उसे गलत घोषित किया जाना चाहिए. मेहता ने कहा कि भारत में महिलाओं को उच्च स्थान दिया गया है. यहां देवताओं की ही नहीं, देवियों की भी पूजा होती है. हर बात को पितृसत्ता से जोड़ कर देखना एक पश्चिमी सोच है. इससे प्रभावित होकर मामले में बहस की गई और उसका असर फैसले पर भी दिखा.
और क्या कहा सॉलिसिटर जनरल ने?
मेहता ने कहा कि भारत में बहुत से धर्म हैं. उन धर्मों के भीतर भी कई पंथ/संप्रदाय हैं. उन सबके अपने नियम हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 1954 के शिरूर मठ केस में सिर्फ ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं’ के संरक्षण की बात कही. लेकिन यह देखना होगा कि क्या कोर्ट उनकी पहचान में सक्षम है? क्या जज धार्मिक विषयों के विशेषज्ञ हैं? धार्मिक मामलों का प्रबंधन एक सामूहिक अधिकार है. उसका संरक्षण किया जाना चाहिए.
सॉलिसिटर जनरल ने पूछा सवाल
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि हर धार्मिक जगह के अपने नियम होते हैं. जैसे कि दरगाह या गुरुद्वारे में सिर ढंक कर जाना. संवैधानिक अधिकारों के हिसाब से देखा जाए तो कोई इसका विरोध ‘अपना शरीर, अपनी मर्जी’ के सिद्धांत को आधार पर कर सकता है. इस बात पर विचार करना जरूरी है कि क्या आधुनिक अवधारणाओं के चलते धार्मिक परंपराओं को बदला जाए? क्या कोर्ट को ऐसा करने का अधिकार है?
सुनवाई के दौरान बेंच के सदस्य जजों ने कई सवाल किए. जस्टिस बी वी नागरत्ना ने याद दिलाया कि 2018 के फैसले में महिलाओं को सबरीमाला मंदिर जाने में रोकना से रोकने को एक तरह की छुआछूत बताया गया था. इसका जवाब देते हुए मेहता ने कहा कि मंदिर के एक विशेष स्वरुप के चलते बने नियम को छुआछूत की तरह देखना गलत है. पहले समाज के कुछ वर्गों के साथ जो भेदभाव होता था, उसे दूर करना एक संवैधानिक कर्तव्य था. दोनों बातों में तुलना गलत है.



