Thursday, April 9, 2026
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धार्मिक परंपराओं पर सुप्रीम कोर्ट में दूसरे दिन की सुनवाई पूरी, केंद्र ने कहा – ‘SC के कुछ फैसलों से डॉ. अंबेडकर भी हैरान हो जाते’

सबरीमाला मंदिर फैसले पर दोबारा विचार की मांग से सामने आए संवैधानिक सवालों पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का दूसरा दिन भी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के नाम रहा. चीफ जस्टिस सूर्य कांत ली अध्यक्षता में बैठी 9 जजों की बेंच को संबोधित करते हुए मेहता ने कहा कि धार्मिक प्रथाओं के मूल्यांकन को लेकर कोर्ट की शक्ति बहुत सीमित है. वह ‘संवैधानिक नैतिकता’ को आधार बना कर उन्हें नहीं बदल सकता.

महिलाओं का सम्मान बहुत अहम: तुषार मेहता

मेहता ने कहा कि संविधान उन धार्मिक प्रथाओं को अमान्य करार देता है जो नैतिकता की कसौटी पर गलत हों, लेकिन यहां अर्थ सामाजिक नैतिकता है, संवैधानिक नैतिकता नहीं. सबरीमाला फैसले में नैतिकता का अर्थ संवैधानिक नैतिकता मान लिया गया और सामाजिक नैतिकता को सिर्फ एक भीड़ की बात की तरह देखा गया. महिलाओं का सम्मान बहुत अहम है. लेकिन सबरीमाला मामले में उसे जिस तरह मौलिक अधिकार से जोड़ कर देखा गया, वह गलत है.

उन्होंने कहा कि समलैंगिकता या एडल्ट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का निष्कर्ष सही हो सकता है, लेकिन उन फैसलों में संविधान की जिस तरह से व्याख्या की गई है, उसे देख कर डॉक्टर अंबेडकर या के एम मुंशी हैरत में पड़ जाते. उन्होंने ऐसी व्याख्या की कल्पना ही नहीं की होगी.

समय के साथ बदलती है नैतिकता की परिभाषा: SC

बेंच की सदस्य जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “समय के साथ समाज में नैतिकता की परिभाषा बदलती है. 1950 के दशक में जो बातें सामाजिक रूप से मान्य नहीं थीं, ऐसा जरूरी नहीं है कि वही स्थिति आज भी हो.” इसका जवाब देते हुए मेहता ने कहा, “लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि समय के साथ-साथ संविधान की व्याख्या में भी बदलाव कर दिया जाए.”

केंद्र सरकार की तरफ से पक्ष रख रहे मेहता ने जजों का ध्यान इस पर दिलाया कि संविधान सामाजिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में अपवाद बनाता है. इन बातों को लेकर कोर्ट दखल दे सकता है. लेकिन धार्मिक प्रथाओं का मूल्यांकन कर उन्हें निरस्त करना कोर्ट का काम नहीं है. अनुच्छेद 25(2)(b) गलत प्रथाओं के उन्मूलन का कानून बनाने का अधिकार विधायिका को देता है.

‘धार्मिक मामलों में कोर्ट ही नहीं, सरकार के दखल की भी सीमा है’

9 जजों की बेंच के सदस्य जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने इस दलील कहा, “आप बहुत सरल व्याख्या कर रहे हैं. इसके हिसाब से तो कोर्ट को कोई अधिकार ही नहीं है. हम समझते हैं कि कोर्ट यह तय कर सकता है कि अंधविश्वास क्या है. उसके आधार पर विधायिका कानून बना सकती है.” मेहता ने कहा कि जज इस बात के विशेषज्ञ नहीं हैं. जो बात देश के किसी हिस्से में धार्मिक परंपरा हो, वही बात दूसरे हिस्सों में अंधविश्वास हो सकती है.

तुषार मेहता ने कहा कि धार्मिक मामलों में कोर्ट ही नहीं, सरकार के दखल की भी सीमा है. अगर किसी धार्मिक संप्रदाय में पुजारी का पद पीढ़ी दर पीढ़ी एक परिवार को देने की व्यवस्था है, तो सरकार समाज सुधार के नाम पर उसे नहीं बदल सकती. जस्टिस नागरत्ना ने इससे सहमति जताते हुए कहा कि समाज सुधार के नाम पर किसी धर्म की पहचान नहीं छीनी जा सकती.

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