Tuesday, April 7, 2026
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मेनका गुरुस्वामी ने रचा इतिहास, बनीं देश की पहली LGBTQ सांसद, TMC ने राज्यसभा चुनाव में बनाया था उम्मीदवार

भारत की राजनीति में एक ऐतिहासिक पल सामने आया है. सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने सांसद के रूप में शपथ लेकर नया इतिहास रच दिया है. वह भारत की पहली LGBTQ राज्यसभा सदस्य बन गईं हैं . यह कदम भारत में LGBTQ+ समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

धारा 377 केस में अहम भूमिका
मेनका गुरुस्वामी उन वकीलों में शामिल रही हैं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में उस ऐतिहासिक केस में बहस की थी, जिसके बाद 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को आंशिक रूप से रद्द कर दिया गया. इस फैसले के बाद भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था.

कौन हैं मेनका गुरुस्वामी?
मेनका गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट हैं और कई संवैधानिक मामलों में अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं. उन्होंने 1997 में भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई के साथ काम करते हुए कानून की बारीकियां सीखीं. मेनका उन्हें अपना मेंटर मानती हैं. किरण मनराल की किताब राइजिंग: 30 वीमेन हू चेंज्ड इंडिया में भी मेनका गुरुस्वामी को शामिल किया गया है.

विदेश में पढ़ाई और करियर
अशोक देसाई के साथ करीब डेढ़ साल काम करने के बाद मेनका आगे की पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड चली गईं. उन्होंने 2001 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से सिविल लॉ (BCL) में ग्रेजुएशन किया और इसके बाद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से लॉ में मास्टर्स (LLM) की डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने न्यूयॉर्क में डेविस पोल्क एंड वार्डवेल में एसोसिएट के तौर पर भी काम किया. मेनका गुरुस्वामी का पोर्ट्रेट ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रोड्स हाउस के मिलनर हॉल में लगाया गया है. वह यह सम्मान पाने वाली पहली भारतीय और दुनिया की दूसरी महिला हैं.

मेनका गुरुस्वामी की पार्टनर कौन हैं?
मेनका गुरुस्वामी की पार्टनर अरुंधति काटजू हैं, जो पेशे से वकील हैं. इंडियन पीनल कोड (IPC) की धारा 377 के खिलाफ कानूनी लड़ाई में मेनका गुरुस्वामी और उनकी पार्टनर अरुंधति काटजू दोनों अहम भूमिका में थीं. साल 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने धारा 377 को खत्म कर दिया था, लेकिन इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट में मेनका और अरुंधति ने मिलकर इस मामले की पैरवी की. हालांकि, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए धारा 377 को फिर से लागू कर दिया.

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