मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और ईरान की ओर से होर्मुज स्ट्रेट को बंद किए जाने के बाद से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी का रुझान बना हुआ है. सोमवार यानी 30 मार्च 2026 को कच्चे तेल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई. बीते एक महीने से तेल की कीमतों में आग लगी हुई है, लेकिन भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम में बढ़ोतरी नहीं की गई है. बल्कि सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी ही कम कर दी है. इससे सरकार पर कितना बढ़ा बोझ? एक्साइज ड्यूटी में कमी से तेल कंपनियों का कितना ज्यादा घाटा? आम आदमी को फायदा मिलेगा या नुकसान? आइए जानते हैं एक्सप्लेनर में…
सवाल 1: तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारत सरकार ने एक्साइज ड्यूटी क्यों कम की?
जवाब: मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से हार्मुज़ स्ट्रेट में सप्लाई प्रभावित हुई. इससे वैश्विक बाजार में सप्लाई की चिंता बढ़ गई और कीमतें चढ़ गईं. भारत अपनी 88-90% कच्ची तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है, इस झटके से सीधे प्रभावित हुआ. भारतीय कच्चे तेल की टोकरी की कीमत मार्च में औसतन 117 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रही.
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि सरकार ने टैक्सेशन राजस्व पर बड़ा झटका लिया है ताकि तेल कंपनियों के बहुत ज्यादा घाटे (लगभग 24 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल पर और 30 रुपये प्रति लीटर डीजल पर) को कुछ कम किया जा सके. इस कटौती से उपभोक्ताओं के लिए तेल की कीमतों को बढ़ने से बचाया है और महंगाई पर भी काबू रखने में मदद मिलेगी. साथ ही, सरकार ने डीजल एक्सपोर्ट पर 21.5 रुपये और एविएशन टर्बाइन फ्यूल पर 29.5 रुपये प्रति लीटर का एक्सपोर्ट ड्यूटी लगाई है ताकि घरेलू सप्लाई प्रभावित न हो और विदेशी बाजार में अनचाहे मुनाफे को रोका जा सके.
सवाल 2: तेल कंपनियों (OMCs) का घाटा कितना बढ़ गया है?
जवाब: पब्लिक सेक्टर की तेल मार्केटिंग कंपनियां (IOC, BPCL, HPCL) अभी भी भारी घाटे में हैं क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय कीमतों से काफी कम दाम पर पेट्रोल और डीजल बेच रही हैं. हरदीप सिंह पुरी के मुताबिक, पेट्रोल पर प्रति लीटर करीब 24 रुपये और डीजल पर 30 रुपये का अंडर-रिकवरी (घाटा) है. कुछ रिपोर्ट्स में यह आंकड़ा और भी ज्यादा बताया गया है.
रोजमर्रा की तेल की खपत की बात करें तो इन कंपनियों का कुल अंडर-रिकवरी करीब 2,400 करोड़ रुपये (24 अरब रुपये) प्रतिदिन है. एक्साइज ड्यूटी की कटौती से यह घाटा लगभग 30-40% तक कम हुआ है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. कंपनियां अभी भी नुकसान उठा रही हैं, जिससे उनकी बैलेंस शीट पर दबाव है. निजी कंपनियां जैसे नायरा एनर्जी ने कुछ दाम बढ़ाए, लेकिन सरकारी कंपनियां ज्यादातर दाम स्थिर रखे हुए हैं.
सवाल 3: एक्साइज ड्यूटी कम करने से सरकार पर कितना बड़ा बोझ पड़ रहा है?
जवाब: एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती से सरकार को राजस्व का बड़ा नुकसान हो रहा है. अनुमान है कि अगर यह कटौती पूरे वित्त वर्ष 2026-27 में बनी रही तो सरकार को 1.3 लाख करोड़ से 1.7 लाख करोड़ रुपये तक का राजस्व घाटा हो सकता है. कुछ एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि घाटा 1.55 लाख करोड़ या 1.75 लाख करोड़ तक भी बढ़ सकता है.
CBIC चेयरमैन विवेक चतुर्वेदी ने कहा कि अगले 15 दिनों में ही करीब 7,000 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान होगा. यह राशि मूल रूप से वित्त मंत्रालय से तेल कंपनियों की तरफ शिफ्ट हो रही है. नतीजतन, सरकार का फिस्कल डेफिसिट (घाटा) बढ़ सकता है. साथ ही, फर्टिलाइजर सब्सिडी पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका है.
सवाल 4: तो फिर इससे आम आदमी को फायदा मिलेगा या नुकसान?
जवाब: फिलहाल पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़े हैं, इसलिए उपभोक्ताओं को सीधी राहत है. महंगाई पर नियंत्रण रहने से ट्रांसपोर्ट, किराना और अन्य जरूरी चीजों की कीमतें स्थिर रहने में मदद मिलेगी, लेकिन लंबे समय में अगर घाटा बढ़ता रहा तो सरकार को अन्य जगहों से राजस्व जुटाना पड़ सकता है या खर्च कम करना पड़ सकता है. यह अप्रत्यक्ष रूप से अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है.
सवाल 5: आगे क्या हो सकता है?
जवाब: यह स्थिति मिडिल ईस्ट के तनाव पर निर्भर करती है. अगर हार्मुज़ स्ट्रेट में सप्लाई सामान्य हुई तो कीमतें कुछ कम हो सकती हैं. सरकार हर दो हफ्ते में ड्यूटी की समीक्षा कर रही है. तेल कंपनियां भी अपनी लागत प्रबंधित करने की कोशिश कर रही हैं. भारत ने रूस जैसे वैकल्पिक स्रोतों से आयात बढ़ाया है और रणनीतिक भंडारण का इस्तेमाल कर रहा है.
यह फैसला सरकार का साफ संदेश है कि उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था को तेल की अस्थिरता से बचाया जाएगा. फिर चाहे इसमें राजस्व और तेल कंपनियों की बैलेंस शीट पर कुछ बोझ पड़े, लेकिन लंबे समय तक यह स्थिति टिकाऊ नहीं हो सकती, इसलिए कूटनीतिक प्रयास और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर जोर जरूरी है.



