ईरान युद्ध में अपने आप को मध्यस्थ के तौर पर पेश कर रहा पाकिस्तान एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है. पाकिस्तान खुद भले ही अफगानिस्तान से संघर्ष में उलझा हो, लेकिन मिडिल ईस्ट में चल रही जंग को रुकवाने के लिए मीडिएटर बनकर अमेरिका की मदद कर रहा है. इसका फायदा भी उसे मिला है. आईएमएफ ने दो अलग-अलग सिस्टम के साथ 1.2 अरब डॉलर का लोन मंजूर कर दिया है.
पाकिस्तान की अहम भूमिका को लेकर कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने भारत सरकार और प्रधानमंत्री मोदी से सवाल किया है. उन्होंने पूछा है कि आखिर उन्होंने ऐसा कैसे होने दिया? सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट करते हुए जयराम रमेश ने कहा कि यह एक ऐसा देश है, जहां लोकतंत्र एक मजाक बनकर रह गया है. यह एक ऐसा देश है, जिसकी अर्थव्यवस्था बदहाल है और जो IMF तथा चीन और सऊदी अरब जैसे कुछ अन्य दाताओं से मिली जीवनरेखा पर निर्भर है. यह एक ऐसा देश है, जिसे दशकों से आतंकवादियों के पनाहगाह के रूप में जाना जाता रहा है, जो न केवल अपने पड़ोसियों पर बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हमले करते हैं. यह एक ऐसा देश है, जिसके साथ राष्ट्रपति क्लिंटन, बुश, ओबामा और बाइडेन ने बहुत सख्ती से व्यवहार किया था.
मोदी सरकार की कमी को दर्शाता है: जयराम रमेश
रमेश ने कहा कि अब, नवंबर 2008 में मुंबई में अपने आतंकी हमले के बाद अलग-थलग पड़ जाने के बावजूद, पाकिस्तान को एक नई स्वीकृति मिल गई है. डॉ. एस. जयशंकर के शब्दों में, पाकिस्तान का दलाल बन जाना ऑपरेशन सिंदूर में भारत की शानदार सैन्य सफलता के बाद मोदी सरकार की विदेश नीति, कूटनीतिक सक्रियता और नैरेटिव प्रबंधन की भारी नाकामी को दिखाता है. निस्संदेह, राष्ट्रपति ट्रंप (जो पीएम मोदी के अच्छे मित्र बताए जाते हैं) ने पाकिस्तान की वर्तमान स्वीकार्यता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है. लेकिन PM ने ऐसा क्यों और कैसे होने दिया, जबकि वे सितंबर 2019 में ह्यूस्टन के Howdy Modi और फरवरी 2020 में अहमदाबाद के Namaste Trump कार्यक्रम के जरिए व्हाइट हाउस से अपने खास रिश्तों का बखान करते रहे हैं?
पीएम ने US को खुश करने के कई तरीके अपनाए: जयराम रमेश
कांग्रेस नेता ने कहा, ‘प्रधानमंत्री ने अमेरिका को खुश करने के लिए कई तरीके अपनाए. यहां तक कि जिस ट्रेड डील ने भारतीय कृषि बाजारों में अमेरिका को अभूतपूर्व पहुंच दी और जिसे भारत के किसानों के साथ विश्वासघात माना गया, वह भी उन्हें अमेरिका से कोई कूटनीतिक लाभ दिलाने में मदद नहीं कर सका. उन्हें केवल एक झुकने वाले और दब्बू नेता के तौर पर देखा जाता है.’
प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि वे दुनिया भर के नेताओं से लगातार फोन पर बात कर रहे हैं. यह निश्चित रूप से अच्छी बात है कि वे ऐसा कर रहे हैं, लेकिन उनकी अत्यधिक व्यक्तित्व-आधारित विदेश नीति के बिखरने ने स्वयंभू विश्वगुरु की विश्वफोनी के रूप में पोल खोल दी है.
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