असम की मरियानी विधानसभा सीट एक बार फिर राज्य की सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीटों में शामिल हो गई है. इस बार के विधानसभा चुनाव में विरासत बनाम बदलाव की दिलचस्प सियासी खींचतान देखने को मिल रही है. यहां दशकों से स्थापित राजनीतिक पकड़ को एक नई चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
यहां पर तीन दशकों से कुर्मी परिवार का प्रभाव बना हुआ है. इसकी शुरुआत साल 1991 में हुई थी, जब रूपम कुर्मी ने पहली बार जीत हासिल की और 2004 तक राजनीतिक रूप से इस इलाके प्रतिनिधित्व किया. वह कांग्रेस की सीनियर नेता थीं. इसके अलावा वह पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रह चुकी थीं.
4 फरवरी 2004 को उनका निधन हो गया. इसके बाद उनके बेटे ने उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया. 2006 से रूपज्योती कुर्मी ने इस सीट पर जीत हासिल की. वह 2006, 2011 और 2016 और 2021 में बतौर कांग्रेस उम्मीदवार मैदान में उतरे. जून 2021 में उन्होंने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया और बीजेपी में शामिल हो गए. इसके बाद अक्टूबर 2021 में हुए उपचुनाव में जीत हासिल कर अपना जनाधार साबित किया. 2004 से 2006 के छोटे अंतराल को छोड़ दें तो 1991 से अब तक मरियानी सीट लगभग पूरी तरह कुर्मी परिवार के नियंत्रण में रही है, जिससे यह असम की सबसे मजबूत राजनीतिक सीटों में गिनी जाती है.
नए चेहरे की एंट्री से बदला समीकरण
इस बार चुनाव में एक नया मोड़ आया है. कांग्रेस और राइजोर दल के गठबंधन ने डॉ. ज्ञानश्री बोरा को संयुक्त उम्मीदवार बनाया है, जो पहली बार चुनावी मैदान में उतर रही हैं. पूर्व शिक्षिका डॉ. बोरा खुद को जमीनी मुद्दों पर काम करने वाली उम्मीदवार के रूप में पेश कर रही हैं. उन्होंने साफ कहा है कि उनका मुख्य लक्ष्य मरियानी की जनता की समस्याओं को विधानसभा में मजबूती से उठाना और उनका समाधान सुनिश्चित करना होगा.
चुनाव के मुख्य मुद्दे?
डॉ. बोरा का चुनाव अभियान कई महत्वपूर्ण स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित है. इनमें असम–नागालैंड सीमा विवाद (जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग प्रभावित हैं), स्वच्छ पेयजल की कमी, खराब सड़क और बुनियादी ढांचा, युवाओं के बीच बढ़ती बेरोजगारी जैसे मुद्दे शामिल हैं. स्थायी शिक्षण करियर छोड़कर राजनीति में आने का उनका फैसला भी जनता के बीच समर्पण और बदलाव के प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा है.
रूपज्योति कुर्मी की ताकत
वहीं दूसरी ओर रूपज्योति कुर्मी इस चुनाव में कई मजबूत पक्षों के साथ उतर रहे हैं. इनमें लंबा राजनीतिक अनुभव, मजबूत जमीनी नेटवर्क, भाजपा का संगठित ढांचा, विकास कार्यों और जनसंपर्क का रिकॉर्ड शामिल है. 2021 में पार्टी बदलने के बावजूद उनका चुनाव जीतना यह दिखाता है कि उनका व्यक्तिगत जनाधार काफी मजबूत है.
मरियानी की राजनीति में निर्णायक मोड़
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2026 का यह चुनाव केवल एक सामान्य मुकाबला नहीं, बल्कि मरियानी की राजनीति के लिए एक निर्णायक मोड़ है. यह विरासत, अनुभव और निरंतरता (रूपज्योति कुर्मी) बनाम बदलाव, नई सोच और मुद्दा-आधारित राजनीति (डॉ. ज्ञानश्री बोरा) के बीच मुकाबला है. यह चुनाव तय करेगा कि मतदाता पुराने और स्थापित नेतृत्व पर भरोसा बनाए रखते हैं या नई दिशा की ओर कदम बढ़ाते हैं.
एक्सपर्ट्स की पूरे चुनाव पर क्या राय है?
इस पर एक्सपर्ट्स का कहना है कि कुर्मी परिवार का मजबूत इतिहास और भाजपा की संगठनात्मक ताकत रूपज्योति कुर्मी को बढ़त देती है, लेकिन सत्ता विरोधी लहर और नए चेहरे का आकर्षण मुकाबले को कड़ा बना सकता है. डॉ. बोरा के लिए चुनौती यह होगी कि वह जन असंतोष को वोट में बदल सकें, खासकर युवाओं और पहली बार वोट देने वालों के बीच. वहीं कुर्मी के सामने चुनौती है कि वह अपने समर्थन को बनाए रखते हुए बदलाव की मांग का सामना करें. जैसे-जैसे चुनाव प्रचार तेज हो रहा है, मरियानी एक अहम राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है. यह मुकाबला न सिर्फ हाई-वोल्टेज और करीबी होने जा रहा है, बल्कि इसके नतीजे का असर व्यापक राजनीतिक परिदृश्य पर भी पड़ सकता है. अब सभी की नजर मरियानी के मतदाताओं पर है—क्या वे अनुभव और निरंतरता को चुनेंगे या बदलाव और नई आवाज को मौका देंगे? यही फैसला इस ऐतिहासिक सीट के अगले अध्याय को तय करेगा.
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