भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने भले ही संसद में ये दावा किया है कि भारत के पास पर्याप्त मात्रा में तेल और गैस का भंडार है, लेकिन इसकी हकीकत देश के हर गांव और हर शहर में कुछ और ही नजर आने लगी है, जहां तेल तो नहीं पर गैस के लिए लंबी-लंबी लाइन लग रही है. ऐसे में इस बात को समझना जरूरी हो जाता है कि क्या सच में भारत के पास गैस का पर्याप्त भंडार है या फिर ये बयानबाजी महज दिल को खुश रखने को की जा रही है.
तो सच बात ये है कि भारत के पास स्टोरेज के तौर पर मुश्किल से 22 से 25 दिनों की ही गैस स्टोरेज है. और भारत की क्षमता भी बस इतनी ही है कि वो 22 से 25 दिनों का ही स्टोरेज कर पाता है. अगर खपत के हिसाब से देखें तो भारत साल में करीब 34 मिलियन टन एलपीजी की खपत करता है. इस हिसाब से महीने की खपत करीब 2.83 मिलियन टन एलपीजी है. अब भारत अपनी जरूरत का 60 फीसदी एलपीजी बाहर से खरीदता है और 40 फीसदी खुद भारत में बना लेता है. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी कि पीपीएसी का जनवरी का आंकड़ा कहता है कि जनवरी 2026 में भारत में एलपीजी का कुल उत्पादन 1.158 मिलियन टन था जबकि जनवरी 2026 में ही भारत ने 2.192 मीलियन टन एलपीजी का आयात किया था.
अब जो आयात है उसका 90 फीसदी हिस्सा तो पूरी तरह से रुक गया है. क्योंकि भारत के आयात का 90 फीसदी हिस्सा खाड़ी देशों से आता है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट कहती है कि भारत अपने कुल आयात का करीब 34 फीसदी हिस्सा कतर से खरीदता है और 26 फीसदी हिस्सा यूएई से. बाकी सऊदी अरब और कुवैत भी भारत को एलपीजी की सप्लाई करते हैं. लेकिन इन सभी देशों से भारत को जो गैस आती है, वो होर्मुज स्ट्रेट से आती है. और ये रास्ता तो अभी बंद है. लिहाजा भारत में गैस नहीं आ रही है.
तो भारत में अभी जो सप्लाई है, वो भारत की स्टोरेज से हो रही है. और भारत में स्टोरेज कितना है, उसे समझ लेंगें तो भारत में गैस की किल्लत की कहानी आसानी से समझ में आ जाएगी. S&P ग्लोबल कमोडिटी इनसाइट्स की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत की कुल एलपीजी भंडारण क्षमता करीब 1.9 मिलियन टन है, जिससे करीब 22 दिनों तक देश में गैस की आपूर्ति हो सकती है. इनमें से कुछ हिस्सा स्टोर होता है विशाखापत्तनम और मंगलुरु की अंडरग्राउंड गुफाओं में जिन्हें ‘रॉक कैवर्न्स’ कहते हैं. मंगलुरु के रॉक कैवर्न्स की क्षमता 80,000 टन है और विशाखापत्तनम की क्षमता 60,000 टन. अब इस स्टोरेज से तो भारत में मुश्किल से दो दिनों का ही बैकअप है.
लेकिन अभी 20 दिनों से ज्यादा का बैकअप और भी कुछ जगहों पर है. जैसे सबसे ज्यादा स्टोरेज इंडियन ऑयल, एचपी और बीपीसीएल जैसी गैस कंपनियों के 200 से भी ज्यादा एलपीजी बॉटलिंग प्लांट्स में है, जहां बुलेट्स में एलपीजी को स्टोर किया गया है. इसके अलावा भारत में 23 से भी ज्यादा तेल रिफाइनरियां हैं, जहां एलपीजी बनाई जाती है. इन रिफाइनरियों में भी बड़े-बड़े स्टोरेज टैंक होते हैं, जहां एलपीजी स्टोर है. जब तक गैस पाइपलाइन या टैंकरों के जरिए बाहर नहीं भेजी जाती, वह इसी बफर का हिस्सा रहती है. इसके अलावा भारत के पास कुछ ट्रांजिट स्टॉक भी हैं, यानी कि वो गैस जो रिफाइनरी से निकलकर बॉटलिंग प्लांट्स तक जाती है और फिर वहां से सिलेंडर में भरकर ट्रकों के जरिए अलग-अलग भेजी जा रही होती है. बाकी कुछ गैस एलपीजी की पाइपलाइंस में भी मौजूद है. इन सबको जोड़ दिया जाए तो भारत के पास 22 से 25 दिनों का स्टोरेज है.
इस स्टोरेज को किफायत से खर्च किया जाए, इसके लिए ही गैस कंपनियां लोगों को हिदायत दे रही हैं कि उबाल आने के बाद आंच धीमी करें और खाना प्रेशर कुकर में बनाएं जिससे 25 फीसदी गैस की बचत होगी. बाकी तो पेट्रोलियम मंत्री ने कहा ही है कि भारत अपना घरेलू उत्पादन 28 फीसदी तक बढ़ा चुका है. भारत का पुराना घरेलू उत्पादन 1.158 मिलियन टन था. अब अगर ये 28 फीसदी बढ़ भी गया है तो उत्पादन बढ़कर करीब करीब 1.5 मिलियन टन ही हो पाएगा. जबकि भारत में एलजीपी का हर रोज का खर्च करीब 90,000 टन का है. ऐसे में भारत हर महीने जितना उत्पादन करता है या अभी कर रहा है, वो विदेशी सप्लाई न होने पर 15 दिनों के लिए भी पर्याप्त नहीं होगा. बाकी होर्मुज बंद है, तो सप्लाई भी बंद है. जब तक होर्मुज नहीं खुलता, भारत की गैस सप्लाई तो बाधित होगी ही होगी.



