Wednesday, March 11, 2026
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Passive Euthanasia: हरीश राणा की इच्छामृत्यु को सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, कहा- मेडिकल सपोर्ट सिस्टम हटाया जाए

पैसिव युथनेसिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (11 मार्च, 2026) को मंजूरी दे दी. कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा का मेडिकल सपोर्ट सिस्टम हटाने का आदेश दिया है. हरीश के परिवार ने याचिका दाखिल करके उसका मेडिकल सिस्टम हटाने और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए अपील की थी. 13 सालों से हरीश बिस्तर पर है. कॉलेज में एक दुर्घटना के दौरान हरीश के सिर में चोट लगी, जिसके बाद उसके ब्रेन को नुकसान पहुंचा. तब से वह इसी हालत में है.

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि हरीश राणा को जिस तरह से जीवित रखा जा रहा है, उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम की तरह ही देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि जब मरीज स्वयं अपना निर्णय लेने की स्थिति में न हो तो उसके करीबी लोगों को उसके सर्वोच्च हित पर  फैसला लेना होता है. कोर्ट ने कहा कि 13 सालों से हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है. कृत्रिम तरीके से मरीज को जीवित रखना तभी उचित है जब उसे इलाज से लाभ पहुंच रहा हो. उसके ठीक हो जाने की संभावना हो.

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा कि मरीज को दिल्ली के एम्स हॉस्पिटल में भर्ती किया जाए और जो भी जरूरी प्रक्रिया हो वो की जाए. कोर्ट ने याचिका पर 30 दिन की दोबारा विचार अवधि को भी हटा दिया. जस्टिस पारदीवाला ने अपने आदेश में कहा कि साल 2018 के हमने कॉमन कॉज फैसले के कुछ पहलुओं को और बेहतर बनाने की कोशिश की है. 

उन्होंने कहा, ‘पैसिव युथनेसिया पर 2018 में फैसला आया. इस फैसले में हमने जीवन और मृत्यु के बीच मानव गरिमा के पहलुओं का विश्लेषण किया है. दूसरे देशों में मरीज के सर्वोच्च हित के आकलन से भी तुलना की है.’ जस्टिस पारदीवाला ने जस्टिस केवी विश्वनाथन की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘मेरे भाई जस्टिस विश्वनाथन ने भी फैसला लिखा है. वह भी उसे पढ़ेंगे. हालांकि, दोनों का निष्कर्ष एक ही है.’

जस्टिस पारदीवाला ने कहा, ‘हरीश राणा एक प्रतिभाशाली युवक था. कॉलेज में हुई दुर्घटना के बाद उसके मस्तिष्क को पहुंचे नुकसान के चलते उसकी दशा खराब हो गई. मेडिकल रिपोर्ट बताती है कि उसकी स्थिति में 13 साल से कोई सुधार नहीं हुआ है.’

जस्टिस पारदीवाला ने आदेश में भविष्य के लिए पैसिव युथनेसिया मामलों पर दिशा-निर्देश तय किए. कोर्ट ने कहा, ‘मरीज का मेडिकल ट्रीटमेंट मानवीय तरीके से डॉक्टरों की देख-रेख में चरणबद्ध तरीके से हटाया जाना चाहिए. यह प्रक्रिया हॉस्पिटल में ही होनी जरूरी नहीं है. घर पर भी हो सकती है.’

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