Harish Rana Euthanasia Case: कहते हैं कि दुनिया में सबसे भारी बोझ एक पिता के कंधे पर उसके जवान बेटे की अर्थी होती है, लेकिन कल्पना कीजिए उस पिता की पीड़ा की, जो पिछले 13 सालों से हर दिन भगवान से अपने बेटे के लिए ‘मौत’ मांग रहा हो. यह कहानी केवल गाजियाबाद के एक मध्यमवर्गीय परिवार की कानूनी लड़ाई की नहीं है, बल्कि यह कहानी है ऐसे पिता अशोक राणा की, जिसकी आंखों का पानी सूख चुका है और उस मां निर्मला देवी की, जिसकी ममता ने 4700 से ज्यादा रातें अपने बेटे की ट्यूब साफ करते हुए गुजार दीं.
साल 2013 में हुआ एक हादसा साल 2026 तक आते-आते एक ऐसे अंतहीन ‘नरक’ में बदल गया, जहां जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा धुंधली पड़ गई थी. हरीश राणा, जो कभी अपने परिवार की उम्मीदों का सूरज था, पिछले 13 सालों से एक बिस्तर पर ‘वेजिटेटिव स्टेट’ में कैद था. न वह देख सकता था, न बोल सकता था और न ही अपने शरीर पर पड़ रहे गहरे घावों का दर्द बयां कर सकता था.
जब 11 मार्च 2026 को अदालत के गलियारों में ‘इच्छामृत्यु’ का फैसला गूंजा तो वह किसी की हार नहीं, बल्कि एक बेटे की उस कैद से रिहाई थी, जिसे समाज ‘जीवन’ कहता था. इच्छामृत्यु का यह केस उस पिता के टूटे हुए स्वाभिमान, एक मां के अटूट धैर्य और एक ऐसे फैसले की दास्तां है, जिसने भारत को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या ‘गरिमा के साथ मरना’ भी उतना ही जरूरी है, जितना ‘गरिमा के साथ जीना’?
काल बनकर आया 20 अगस्त 2013 का वो दिन
यह घटना 20 अगस्त 2013, रक्षाबंधन के दिन की है. हरीश राणा उस समय चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी (CU) में सिविल इंजीनियरिंग के आखिरी साल के छात्र थे. वह यूनिवर्सिटी के पास ही एक पीजी में रहते थे. प्रत्यक्षदर्शियों और शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, हरीश पीजी की चौथी मंजिल की बालकनी या छत के किनारे पर थे, जहां से उनका संतुलन बिगड़ गया और वे सीधे नीचे गिर गए.
गिरने के कारण उनके सिर में गंभीर आंतरिक चोटें आईं और उनके सिर की हड्डियां टूट गई थीं और रीढ़ की हड्डी में भी गहरा आघात लगा था. उन्हें तुरंत पास के एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया. डॉक्टरों ने उनको बचाने के लिए कई न्यूरोसर्जरी कीं, लेकिन मस्तिष्क को पहुंचा नुकसान इतना गहरा था कि वह कभी होश में नहीं आ सके. वह ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ में चले गए.
साल दर साल चला संघर्ष
हादसे के बाद हरीश के पिता उन्हें गाजियाबाद के कई अस्पतालों और दिल्ली के एम्स में भटके, लेकिन डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि उनके ठीक होने की संभावना 1% से भी कम है. पिछले 13 सालों से, हरीश की दुनिया केवल एक बिस्तर और उनके गले में लगी ट्रैकियोस्टोमी ट्यूब (सांस के लिए) और पेट में लगी PEG ट्यूब (भोजन के लिए) तक सीमित होकर रह गई थी. उनके शरीर का वजन आधा रह गया, हड्डियां दिखने लगी. वह केवल अपनी आंखें खोल सकते थे, लेकिन किसी को पहचान नहीं सकते थे.
सब कुछ झोंक कर बेटे के लिए मांगी मौत!
हरीश राणा का परिवार एक छोटा और मध्यमवर्गीय परिवार है, जिसने पिछले 13 सालों से उनके इलाज और कानूनी लड़ाई में अपना सब कुछ झोंक दिया. हरीश के पिता इस पूरी कानूनी लड़ाई का मुख्य चेहरा रहे हैं. उन्होंने अपने बेटे के इलाज के लिए गाजियाबाद का अपना घर तक बेच दिया और सालों तक अदालतों के चक्कर काटे. वे एक निजी कंपनी में कार्यरत थे, लेकिन बेटे की देखभाल और केस के कारण उनका जीवन पूरी तरह बदल गया.
एक बार कोर्ट में उन्होंने रुंधे गले से कहा था, “मैं अपने बेटे का हत्यारा नहीं बनना चाहता, लेकिन मैं उसे इस नरक जैसी जिंदगी में तड़पते हुए भी नहीं देख सकता. हम बूढ़े हो रहे हैं, हमारे बाद उसका क्या होगा? उसे गरिमा के साथ जाने का हक मिलना चाहिए.”
हरीश को अंतहीन दर्द से मुक्त होते देखना चाहती हूं- मां
हरीश की मां निर्मला देवी ने 2013 से लेकर 2026 तक साये की तरह अपने बेटे की दिन-रात सेवा की. हरीश की फीडिंग ट्यूब साफ करने से लेकर उसे दवाइयां देने तक, उन्होंने एक पल के लिए भी उसे अकेला नहीं छोड़ा. कोर्ट में उनकी याचिकाओं में एक मां की बेबसी और बेटे को दर्द से मुक्त देखने की तड़प साफ झलकती थी. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, “हरीश का बस शरीर रह गया है, उसकी आत्मा पहले ही जा चुकी है. हम उसे मरते हुए नहीं, बल्कि इस अंतहीन दर्द से मुक्त होते देखना चाहते हैं.”
शुरुआत में कई रिश्तेदारों ने मदद की, लेकिन 13 साल एक लंबा वक्त होता है. धीरे-धीरे परिवार अकेला पड़ गया. उनका सामाजिक समारोहों में जाना बंद हो गया, क्योंकि हरीश को एक मिनट के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा जा सकता था.
लेटे-लेटे शरीर पर हो गए थे गहरे घाव
हरीश की स्थिति ऐसी थी कि वह न तो बोल सकता था, न देख सकता था और न ही कोई प्रतिक्रिया दे सकता था. सालों तक एक ही स्थिति में लेटे रहने के कारण हरीश के शरीर पर गहरे घाव हो गए थे. परिवार के लिए सबसे बड़ा इमोशनल टॉर्चर यह था कि वे उसे दर्द में देख रहे थे, लेकिन वह रो भी नहीं सकता था.
हरीश की हालत को देखकर उसके माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की याचिका डाली, लेकिन कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी और कहा था कि भारतीय कानून के तहत सक्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति नहीं है. इसके बाद अगस्त 2024 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. एम्स के डॉक्टरों की टीम ने हरीश के घर जाकर उनकी जांच की थी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट पेश की थी.
11 मार्च 2026: जज रोए और कोर्ट में पसर गया सन्नाटा
हरीश के मां-बाप ने कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ी. आखिरकार वह दिन आ गया, जिसका सबको बेसब्री से इंतजार था. सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को फैसला सुनाया तो कोर्ट रूम में सन्नाटा पसर गया था. फैसला सुनाते हुए जस्टिस पारदीवाला की आंखें भर आईं. फैसला पढ़ते समय उन्होंने टिप्पणी की कि एक पिता का अपनी संतान के लिए ‘मौत’ मांगना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है.
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ‘Right to Life’ यानी जीने का अधिकार में ‘Right to Die with Dignity’ (गरिमा के साथ मरने का अधिकार) भी शामिल है, खासकर तब जब जीवन केवल मशीनों और ट्यूबों के सहारे सिमट गया हो. आखिरकार कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छामृत्यु की इजाजत दे दी.
सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के परिवार की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके परिवार ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा. किसी से प्यार करने का मतलब है, सबसे बुरे समय में भी उनकी देखभाल करना.



