संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत के साथ ही लोकसभा में बड़ा राजनीतिक टकराव देखने को मिल सकता है. सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने का प्रस्ताव सदन में लाया जाएगा. इस प्रस्ताव को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपने सांसदों को सदन में मौजूद रहने के लिए व्हिप जारी किया है.
कार्यसूची में शामिल किया गया प्रस्ताव
लोकसभा की कार्यसूची में सोमवार के लिए अध्यक्ष को हटाने से जुड़े विपक्षी प्रस्ताव को सूचीबद्ध किया गया है. यह नोटिस बजट सत्र के पहले चरण के दौरान विपक्षी दलों की ओर से दिया गया था. इस प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान ओम बिरला सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करेंगे और सांसदों के बीच बैठेंगे.
चर्चा के दौरान अध्यक्ष नहीं करेंगे कार्यवाही की अध्यक्षता
संविधान के प्रावधानों के अनुसार, जब लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ पद से हटाने का प्रस्ताव सदन में आता है, तब वे सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते. इस दौरान वे सत्तापक्ष की अग्रिम पंक्ति में बैठ सकते हैं और उन्हें प्रस्ताव के खिलाफ अपना बचाव करने का अधिकार भी होता है.
विपक्ष का आरोप- चर्चा में भेदभाव
विपक्षी दलों ने अपने नोटिस में आरोप लगाया है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को बोलने का पर्याप्त मौका नहीं दिया गया. विपक्ष का कहना है कि अध्यक्ष ने कार्यवाही के दौरान ‘खुलकर भेदभाव’ किया.
118 विपक्षी सांसदों ने दिया नोटिस
सूत्रों के मुताबिक कम से कम 118 विपक्षी सांसदों ने ओम बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव का नोटिस दिया था. यह नोटिस कांग्रेस सांसद और पार्टी के मुख्य सचेतक के सुरेश ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और डीएमके सहित कई विपक्षी दलों की ओर से लोकसभा सचिवालय को सौंपा. हालांकि, टीएमके के सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए.
नैतिक आधार पर बिरला ने रोकी थी अध्यक्षता
सूत्रों के अनुसार जिस दिन यह नोटिस दिया गया था, उसी दिन से ओम बिरला ने सदन की अध्यक्षता करना बंद कर दिया था. हालांकि, नियमों के मुताबिक वे नोटिस पेश होने तक कार्यवाही की अध्यक्षता कर सकते थे, लेकिन उन्होंने नैतिक आधार पर ऐसा न करने का फैसला किया.
प्रस्ताव पर मतदान का नियम
संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य के मुताबिक अध्यक्ष को प्रस्ताव पर अपनी बात रखने और मतदान करने का अधिकार होता है. हालांकि, वे स्वचालित मतदान प्रणाली का उपयोग नहीं कर पाएंगे और उन्हें अपना वोट देने के लिए अलग से पर्ची भरनी होगी.
साधारण बहुमत से हटाया जा सकता है अध्यक्ष
भारतीय संविधान के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष को सदन में साधारण बहुमत से पारित प्रस्ताव के जरिए पद से हटाया जा सकता है. इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 94 और अनुच्छेद 96 में प्रावधान हैं. बहुमत का हिसाब सदन की प्रभावी सदस्य संख्या के आधार पर लगाया जाता है, न कि सिर्फ मौजूद और वोट देने वाले सदस्यों के आधार पर.
प्रस्ताव की प्रक्रिया क्या होती है
नियमों के अनुसार अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम दो सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं, हालांकि अधिक सदस्य भी इस पर हस्ताक्षर कर सकते हैं. नोटिस लोकसभा महासचिव को दिया जाता है. इसके बाद इसकी प्रारंभिक जांच होती है कि इसमें स्पष्ट और विशिष्ट आरोप हैं या नहीं. जांच पूरी होने के बाद प्रस्ताव को 14 दिन बाद सदन में लाया जा सकता है.
अतीत में भी आए हैं ऐसे प्रस्ताव
लोकसभा के इतिहास में अध्यक्ष के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव पहले भी लाए गए हैं, लेकिन अब तक कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ है. अतीत में जीवी मावलंकर, हुकुम सिंह और बलराम जाखड़ जैसे लोकसभा अध्यक्षों को भी अविश्वास प्रस्तावों का सामना करना पड़ा था, हालांकि ये प्रस्ताव खारिज हो गए थे.



