Sunday, February 15, 2026
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‘भारत में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है, क्योंकि…’, गोरखपुर में आयोजित सभा में बोले संघ प्रमुख मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में आयोजित जन गोष्ठी को संबोधित करते हुए बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि हिंदू समाज की बात ही संघ क्यों करता है, क्योंकि इस देश में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिंदू है. हिंदू समाज मानता है कि हमारा रास्ता भी ठीक है और तुम्हारा भी. इस समाज में रुचि के अनुसार अलग-अलग पंथ-संप्रदाय हैं. हमारे रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन लक्ष्य एक है. इस धारणा को मानने वाला ही हिंदू समाज है.

उन्होंने कहा कि मिलजुल कर चलो, ऐसा मानने वाले को एक नाम हिंदू दिया गया. वास्तव में हिंदू शब्द एक संज्ञा नहीं, बल्कि व्याकरण की दृष्टि से एक विशेषण है, जो गुणधर्म बताता है. जो सबको एक साथ चलाता है. मोक्ष की तरफ ले जाता है, यही हिंदू धर्म है. चूंकि यह हिंदू नाम भारत के साथ रूढ़ हो गया है, इसलिए हिंदू नाम से ही सनातन जगेगा. जो भूल गए है कि हम हिंदू है, उन्हें याद दिलाना है कि आप हिंदू हो, जिससे हिंदू समाज खड़ा हो सकें. हमें अपना ध्येय पूर्ण करना है.

प्रमुख जन गोष्ठी में बोले सरसंघचालक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गोरक्ष प्रांत की ओर से संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में रविवार (15 फरवरी, 2026) को तारामंडल स्थित बाबा गंभीरनाथ ऑडिटोरियम में प्रमुख जन गोष्ठी का आयोजन किया गया. गोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि समाज सहिष्णुता और समन्वयता से ही चलना चाहिए, अपने स्वार्थ के लिए नहीं. दूसरों के हित के लिए चलना ही भारतीय संस्कृति है. इस सत्य को पहचानने से ही हमें शाश्वत आनंद की प्राप्ति हुई.

उन्होंने कहा कि हमारा राष्ट्र धर्म प्राण राष्ट्र है. धर्म हमारे आचरण का हिस्सा है. इसके लिए संस्कार की आवश्यकता थी. पीढ़ी दर पीढ़ी मानवीय आदतें बनाई गई, यही संस्कार है और इससे ही संस्कृति बनी. इसी संस्कृति के आधार पर राष्ट्र का निर्माण हुआ. हम एक हैं इस सत्य को हमने जाना. विविधता के होते हुए हमारे राष्ट्र को जोड़ने का वाला आधार भारत स्वरूप मातृ शक्ति है.

संघ की दृष्टि पूर्णतया भारतीय चिंतन पद्धति से ही विकसित हुई- संघ प्रमुख

संघ प्रमुख ने कहा कि संघ की दृष्टि पूर्णतया भारतीय चिंतन पद्धति से ही विकसित हुई है. आज समाज में संघ से अपेक्षाएं बढ़ी हैं. विश्व के पास ऐसा कोई तरीका नहीं है, जो समाज को सुख और शांति दे सकें, इसलिए वह भी हमारी तरफ आशा भरी नजरों से देख रहा हैं. उन्होंने कहा कि भारत में पाश्चात्य चिंतन का प्रभाव पड़‌ने लगा था, जिसने भारतीय ज्ञान परम्परा को खण्डित करने का प्रयत्न किया और अपने चिंतन को स्थापित करने का प्रयास किया. उनकी चिंतन पद्धति अधूरी थी. भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित हमारी चिंतन पद्धति ही समाज में उत्पन्न शंकाओं का समाधान कर सकती हैं. इसलिए संघ शताब्दी वर्ष में हमने समाज तक जाने का निर्णय लिया, जिससे हम समाज को संगठित कर सकें.

समाज अपना काम करने लगे, तो संघ की जरूरत ही क्यों होगी- भागवत

उन्होंने आगे कहा कि संघ एक स्वायत्त, स्वतंत्र व स्वालंबी संगठन है, जो अपने लिए नहीं राष्ट्र के लिए समर्पित है. पूर्ण समाज फिर से स्वस्थ होकर अपना कार्य करने लगे, तो संघ की आवश्यकता ही क्यों होगी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी परिस्थिति विशेष की प्रतिक्रिया नहीं है और न ही उसका किसी से विरोध है. वह किसी के साथ अपनी स्पर्धा भी नहीं देखता. वह प्रभाव, सत्ता, लोकप्रियता का भी आकांक्षी नहीं है, बल्कि समाज के हित में सभी कार्यों को करने वाला ही संघ है.

बाइबिल के वाक्य ‘I have come to fullfill not to destroy’ के आधार पर उन्होंने कहा,  ‘Sangh has Come to fullfill not to destroy’ अर्थात हम किसी को नष्ट करने के लिए नहीं आए हैं.

भारत की आजादी के लिए चार चिंतन धाराएं चलीं- भागवत

सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि भारत की स्वतंत्रता के लिए चार चिंतन धाराएं चलीं. पहला चिंतन पुनः लड़कर उन्हें हरा दें. सुभाष चंद्र बोस तक यह धारा चली, यह थी क्रांति की धारा. दूसरी धारा के अनुसार समाज में राजनीतिक जागृत नहीं थी, इसलिए हम हारे. समाज में राजनीतिक जागृत पैदा करनी पड़ेगी. यह दूसरी धारा चली. तीसरी धारा अंग्रेजों से बराबरी के लिए आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की धारा और समाज सुधार की धारा थी. यह भी एक द्वीप बन का रह गई. समाज के सागर में. जैसे राममोहन राय आदि ने इस पर प्रयत्न किया. चौथा प्रवाह हम इसलिए भटके क्योंकि हम अपने मूल से अलग हुए. अतः पुनः मूल की तरफ हम बढ़ें. स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद आदि ने किया. इन चारों धाराओं या प्रवाह से हेडगेवार जी का संपर्क रहा.

हमें अपनी कमियों को ठीक करना जरूरी- भागवत

उन्होंने कहा कि हेडगेवार जी ने यह सुनिश्चित करना चाहा कि भारत को स्वतंत्रता तो मिलेगी ही, किन्तु यह पुनः नहीं जाएगी. इसलिए हमें अपनी कमियों को ठीक करना आवश्यक है. समाज को इसके लिए खड़ा करना होगा. हमें अपने स्वार्थ को छोड़‌कर स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु संगठित होना होगा. इसके लिए उन्होंने 1925 ई. में विजयादशमी के दिन संघ के काम को शुरू किया. संघ स्थापना के 14 वर्ष पश्चात संघ की कार्य पद्धति स्पष्ट हुई, जिसका नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. संघ प्रेम और संस्कार से चलेगा, जिसका विचार सनातन होगा. जिसका उद्‌देश्य समाज पुनर्गठित करना होगा. समाज के कृतित्व से ही राष्ट्र बनते या बिगड़ते हैं, इसलिए यदि समाज जागृत होगा, तो कार्य ठीक होगा.

उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण समाज को संगठित करना यह संघ का कार्य हैं. संघ के 100 वर्ष पश्चात् हमें अपने को विस्तार देना है. सुदृढ करना है. इसलिए पंच परिवर्तन विषय को लाया गया है, जिसमें सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्यबोध, पर्यावरण, कुटुंब प्रबोधन, स्व का बोध है. इस पंच परिवर्तन से सशक्त और भव्य समाज का निर्माण करना है.

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