Friday, February 13, 2026
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’14 साल जेल में गुजारने के बाद रद्द हुई सजा’, जज की खामियां बताते हुए केरल HC ने पलटा फैसला

केरल हाईकोर्ट ने 14 साल जेल में बिता चुके शख्स की आजीवन कारावास की सजा यह कहते हुए रद्द कर दी कि उसको निष्पक्ष सुनवाई से वंचित रखा गया. इस शख्स को हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. कोर्ट का कहना है कि सेशन जज ने पब्लिक प्रोसेक्यूटर की अनुपस्थिति में खुद मुख्य जिरह की और आरोपी का पक्ष रखने के लिए कोई सक्षम वकील भी नहीं था. कई गवाहों से अभियुक्तों की अनुपस्थिति में पूछताछ की गई.

जस्टिस राजा विजयराघवन और जस्टिस के. वी. जयकुमार की बेंच ने पाया कि आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखा गया और उसे ऐसे मुकदमे का सामना करना पड़ा, जो टुकड़ों-टुकड़ों में चलाया गया था. कोर्ट ने सेशन कोर्ट की सुनवाई के दौरान जज की खामियों को उजागर किया और कहा कि मुकदमे की एक महत्वपूर्ण अवधि के दौरान आरोपी का प्रतिनिधित्व किसी सक्षम वकील ने नहीं किया था, उसे अहम गवाहों से जिरह खुद करनी पड़ी और कई गवाहों से उसकी गैरमौजूदगी में पूछताछ की गई.

रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि सेशन कोर्ट के जज ने पब्लिक प्रोसेक्यूटर की अनुपस्थिति में खुद उसकी भूमिका निभाई और मुख्य जिरह खुद की. हाईकोर्ट ने 12 जनवरी के अपने फैसले में कहा कि सेशन कोर्ट के जज का दृष्टिकोण ‘अवैध और अनुचित’ था क्योंकि अभियोजन पक्ष के गवाहों से अभियुक्तों की अनुपस्थिति में पूछताछ की गई थी.

मामले को जुलाई 2012 में सेशन कोर्ट भेजा गया था और आरोपी को अक्टूबर 2019 में दोषी ठहराया गया और सजा सुनाई गई. बेंच ने कहा कि वह पूरी अवधि के दौरान न्यायिक हिरासत में था. हाईकोर्ट ने कहा कि सात साल की सुनवाई अवधि के दौरान, आरोप तय होने के बाद मामले को सौ से अधिक बार स्थगित किया गया. उसने सत्र न्यायाधीश की ओर से इसके लिए दिए गए कारणों को ‘अनुचित और बाध्यकारी नहीं’ करार दिया.

हत्या के आरोप में दोषी पाए जाने के बाद आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी और 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया. अभियोजन पक्ष के अनुसार, 18 सितंबर 2011 को ओणम उत्सव के दौरान कोट्टायम जिले के पम्पाडी के पास ताश खेल रहे दो समूहों के बीच कहासुनी हो गई. अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि कहासुनी के दौरान आरोपी ने पीड़ित को चाकू मार दिया, जिसकी बाद में चोटों के कारण मौत हो गई थी.

 

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