सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें एक सिविल जज को बहाल करने का फैसला दिया गया था. मामला 2018 से जुड़ा हुआ है. जज पर आरोप था कि उसने ट्रेन में नशे की हालत में सह-यात्री के सामने पेशाब की थी. कोर्ट ने इस हरकत को घिनौना करार दिया है.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाई है. यह आदेश हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने 6 मई 2025 को दिया था, इसमें जज को बहाल करने के निर्देश जारी किए गए थे.
सुप्रीम कोर्ट ने इसे घिनौनी हरकत बताया है. सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बेंच ने मौखिक रूप से कहा, ‘उनका बर्ताव देखिए. उन्होंने एक डिब्बे में पेशाब किया. वहां महिला मौजूद थी.’
डिविजन बेंच ने हाईकोर्ट के प्रशासनिक पक्ष के पारित आदेश को रद्द कर दिया था, इसमें न्यायिक अधिकारी को सर्विस से हटाने की सिफारिश की गई थी.
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, सिविल जज नवनीत सिंह यादव पर 17 जून 2018 को भोपाल से जबलपुर जाते समय नशे की हालत में सह-यात्रियों को परेशान करने और ट्रेन के डिब्बे के अंदर अश्लील हरकतें करने का आरोप था.
आरोप है कि उन्होंने एक महिला सहयात्री की बर्थ के सामने पेशाब किया. इससे दूसरे यात्रियों ने चेन खींच दी और ट्रेन लेट हो गई. यादव को पिपली में ट्रेन से उतारा गया. गिरफ्तार किया गया. बाद में जमानत पर रिहा कर दिया गया.
उन्हें जून 2018 में एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था और न्यायिक अधिकारी ने इसका विस्तृत जवाब दिया, जिसमें उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया. उन्हीं आरोपों के लिए उनपर रेलवे अधिनियम 1989 की धारा 145 के तहत भी मुकदमा चलाया गया था. विस्तृत सुनवाई के बाद स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट जबलपुर ने मार्च 2019 में उन्हें बरी कर दिया.
2019 में आरोपी जज को किया गया था सस्पेंड
यादव को सितंबर 2018 में एक और कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, साथ ही आरोप पत्र और प्रारंभिक जांच रिपोर्ट भी दी गई. इस बार भी उन्होंने सभी आरोपों से इनकार किया. अपने आदेश में हाई कोर्ट के प्रशासनिक पक्ष ने कहा कि जांच अधिकारी ने यादव को आरोपों का दोषी पाया था. इसने यह भी कहा कि यादव ने बिना पूर्व अनुमति के ट्रेन में यात्रा की थी और अपनी गिरफ्तारी के बारे में अपने वरिष्ठों को सूचित नहीं किया था. बाद में एडमिनिस्ट्रेटिव कमेटी ने यादव को नौकरी से हटाने का प्रस्ताव दिया, जिसे सितंबर 2019 में हाई कोर्ट ने मंजूरी दे दी. फुल कोर्ट की सिफारिश के बाद 28 सितंबर 2019 के एक आदेश द्वारा उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं.
हाई कोर्ट ने जज को कर दिया बहाल
इसके बाद उन्होंने आदेश और एडमिनिस्ट्रेटिव कमेटी की सिफारिश साथ ही फुल कोर्ट के फैसले को रद्द करने की मांग करते हुए हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की. उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट ने उन्हें बरी कर दिया था. रिकॉर्ड में कोई मेडिकल सबूत नहीं था जो शराब पीने की पुष्टि करता हो.
हाईकोर्ट ने कहा, ‘मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता को स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट द्वारा बरी करना सिर्फ तकनीकी आधार पर या अभियोजन की कमी के कारण नहीं था, बल्कि, यह रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की पूरी जांच का नतीजा था.’
डिवीजन बेंच के आदेश से दुखी होकर हाईकोर्ट की रजिस्ट्री ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. इसमें न्यायिक अधिकारी को नोटिस जारी किया.



